श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  1.12.21 
धन्विनामग्रणीरेष तुल्यश्चार्जुनयोर्द्वयो: ।
हुताश इव दुर्धर्ष: समुद्र इव दुस्तर: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
बड़े-बड़े धनुर्धारियों में यह बालक अर्जुन जैसा होगा। अग्नि के समान बाधाओं को पार करने वाला और समुद्र जैसा अनंत और दुर्लंघनीय होगा।
 
This child will be like Arjuna among the great archers. He will be as invincible as Agnidev and as uncrossable as the ocean.
तात्पर्य
इतिहास में दो अर्जुन हुए हैं। एक हैहाया का राजा कार्तवीर्य अर्जुन और दूसरा बालक का पितामह। दोनों ही अर्जुन धनुर्धारी थे और बालक परीक्षित को दोनों के तुल्य बताया गया है, खासकर युद्ध के मामले में। यहाँ पाण्डव अर्जुन का संक्षिप्त वर्णन दिया गया है:

पाण्डव अर्जुन: भगवद गीता के महान नायक। वो महाराज पाण्डु के क्षत्रिय पुत्र हैं। रानी कुंतीदेवी किसी भी देवता का आह्वान कर सकती थीं और इस प्रकार उन्होंने इन्द्र का आह्वान किया और इन्द्र द्वारा अर्जुन का जन्म हुआ। इसलिए अर्जुन स्वर्गीय राजा इन्द्र के पूर्ण अंश हैं। वह फाल्गुन (फरवरी-मार्च) के महीने में जन्म लिया था और इसी कारण उन्हें फाल्गुनी भी कहा जाता है। जब वह कुंती के पुत्र रूप में प्रकट हुए, तो उनकी भावी महानता की घोषणा हवाई संदेशों द्वारा की गई, और ब्रह्मांड के विभिन्न भागों से आने वाले सभी महत्वपूर्ण व्यक्तित्व, जैसे कि देवता, गंधर्व, आदित्य (सूर्य ग्रह से), रुद्र, वसु, नागा, विभिन्न ऋषि (ऋषि) और अप्सरा (स्वर्ग की समाजिक लड़कियाँ) सभी समारोह में उपस्थित हुए। अप्सराओं ने अपने स्वर्गीय नृत्य और गीतों से सभी को प्रसन्न किया। भगवान कृष्ण के पिता और अर्जुन के मामा वसुदेव ने अपने पुरोहित प्रतिनिधि कश्यप को सभी निर्धारित संस्कारों या सुधार प्रक्रियाओं द्वारा अर्जुन को शुद्ध करने के लिए भेजा। ऋषियों, शतशृंग के निवासियों की उपस्थिति में एक नाम देने के उनके संस्कार का प्रदर्शन किया गया। उन्होंने चार पत्नियों, द्रौपदी, सुभद्रा, चित्रांगदा और उलूपी से शादी की, जिनसे उन्हें क्रमशः श्रुतकीर्ति, अभिमन्यु, बभ्रुवाहन और इरावान नाम के चार पुत्र हुए।

अपने छात्र जीवन के दौरान वह अन्य पाण्डवों और कुरुओं के साथ महान प्रोफेसर द्रोणाचार्य के अधीन अध्ययन करने के लिए सौंपा गया था। लेकिन वह अपनी अध्ययन तीव्रता से सभी से आगे निकल गया और द्रोणाचार्य विशेष रूप से उनके अनुशासनात्मक स्नेह से आकर्षित हुए। द्रोणाचार्य ने उन्हें प्रथम श्रेणी के विद्वान के रूप में स्वीकार किया और सैन्य विज्ञान के सभी आशीर्वाद प्रदान करने के लिए हार्दिक रूप से प्यार किया। वह इतना उत्साही छात्र था कि वह रात में भी धनुर्विद्या का अभ्यास करता था, और इन सभी कारणों से प्रोफेसर द्रोणाचार्य उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनाने के लिए दृढ़ थे। उन्होंने लक्ष्य को भेदने की परीक्षा में शानदार ढंग से उत्तीर्ण की और द्रोणाचार्य बहुत प्रसन्न हुए। मणिपुर और त्रिपुरा के शाही परिवार अर्जुन के पुत्र बभ्रुवाहन के वंशज हैं। अर्जुन ने द्रोणाचार्य को मगरमच्छ के हमले से बचाया, और आचार्य ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हें ब्रह्मास्त्र नामक हथियार से पुरस्कृत किया। महाराज द्रुपद द्रोणाचार्य के शत्रु थे, और इस प्रकार जब उन्होंने आचार्य पर हमला किया, तो अर्जुन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और द्रोणाचार्य के सामने लाया। उसने महाराज द्रुपद की अहिछत्र नामक नगरी की घेराबंदी की और इसे अपने कब्जे में लेने के बाद द्रोणाचार्य को दे दिया। ब्रह्मास्त्र हथियार के गोपनीय उपचार की व्याख्या अर्जुन को दी गई, और द्रोणाचार्य को अर्जुन ने वादा किया कि यदि आवश्यक हुआ तो वह हथियार का उपयोग करेंगे जब वह (द्रोणाचार्य) व्यक्तिगत रूप से अर्जुन के शत्रु बनेंगे। इसके द्वारा, आचार्य ने कुरुक्षेत्र के भावी युद्ध की भविष्यवाणी की थी, जिसमें द्रोणाचार्य विपरीत दिशा में थे। महाराज द्रुपद, हालांकि अर्जुन द्वारा अपने प्रोफेसर द्रोणाचार्य की ओर से पराजित किए गए थे, ने अपनी बेटी द्रौपदी को अपने युवा लड़ाके को सौंपने का फैसला किया, लेकिन जब उन्होंने दुर्योधन द्वारा षड़यंत्र की गई लाह के घर की आग में अर्जुन की मौत की झूठी खबर सुनी तो वह निराश हो गए। इसलिए उन्होंने द्रौपदी के लिए व्यक्तिगत रूप से एक वर चुनने की व्यवस्था की जो छत पर लटकी हुई मछली की आंख को भेद सके। यह तरकीब खास तौर पर इसलिए बनाई गई थी क्योंकि केवल अर्जुन ही ऐसा कर सकता था और वह अर्जुन को अपनी समान रूप से योग्य बेटी सौंपने की अपनी इच्छा में सफल रहा। अर्जुन के भाई उस समय दुर्योधन के साथ समझौते के तहत गुप्त रूप से रह रहे थे और अर्जुन और उनके भाइयों ने द्रौपदी के चयन की बैठक में ब्राह्मणों की पोशाक में भाग लिया। जब सभी क्षत्रिय राजाओं ने एकत्रित होकर देखा कि एक गरीब ब्राह्मण को द्रौपदी ने अपने स्वामी के लिए माला पहनाई है, तो श्री कृष्ण ने बलराम के समक्ष अपनी पहचान का खुलासा किया।

उलूपी से उसकी मुलाकात हरिद्वार में हुई। नागलोक की उस कन्या की ओर वह आकर्षित हुआ और तब इरावान का जन्म हुआ। इसी प्रकार, उसकी भेंट मणिपुर के राजा की पुत्री चित्रांगदा से हुई, तब बभ्रुवाहन का जन्म हुआ। भगवान श्री कृष्ण ने एक योजना बनाई कि अर्जुन की सहायता से श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का हरण कर लिया जाए, क्योंकि बलराम का मन था कि उसका विवाह दुर्योधन के साथ कर दिया जाए। युधिष्ठिर भी श्री कृष्ण से सहमत हुए, और इस प्रकार सुभद्रा को अर्जुन ने बलपूर्वक ले जाकर उनसे विवाह कर लिया। सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु है, जो परीक्षित महाराज के पिता थे जो मृत्युपरांत जन्मे। अर्जुन ने अग्निदेव को खाण्डववन में आग लगाकर संतुष्ट किया, और तब अग्निदेव ने उसे एक अस्त्र दिया। खाण्डववन में आग लगने से इंद्र बहुत क्रोधित हुए, और इसलिए इंद्र ने अन्य सभी देवताओं की सहायता से उसकी बड़ी चुनौती के लिए अर्जुन के साथ युद्ध करना शुरू किया। वे सभी अर्जुन से परास्त हुए और इंद्रदेव अपने स्वर्गीय राज्य लौट गए। अर्जुन ने मयासुर को भी पूर्ण सुरक्षा का वचन दिया, और मयासुर ने उसे देवदत्त के नाम से विख्यात एक मूल्यवान शंख भेंट किया। इसी प्रकार, जब इंद्रदेव अर्जुन के शौर्य को देखकर संतुष्ट हुए तो उन्होंने उसे अनेक अन्य मूल्यवान अस्त्र दिए। जब महाराज युधिष्ठिर मगध के राजा जरासंध को पराजित करने में असमर्थ रहे, तब केवल अर्जुन ने ही राजा युधिष्ठिर को हर प्रकार के आश्वासन दिए, और इस प्रकार अर्जुन, भीम और भगवान श्री कृष्ण जरासंध को मारने मगध के लिए प्रस्थान किए। जब वह संपूर्ण विश्व के दूसरे राजाओं को पाण्डवों के अधीन करने निकले, जैसा कि प्रत्येक सम्राट के राज्याभिषेक के बाद प्रथा थी। उसने केलिन्द नामक देश को जीता और राजा भागदत्त को अपने अधीन किया। फिर उन्होंने अंतागिरि, उलूपपुर और मोदापुर जैसे देशों की यात्रा की और सभी शासकों को अपने अधीन किया। कई बार उसने सख्त तपस्याएँ कीं, और बाद में उसे इंद्रदेव ने पुरस्कृत किया। भगवान शिव भी अर्जुन की शक्ति का परीक्षण करना चाहते थे और भगवान शिव एक आदिवासी के रूप में उससे मिले। उन दोनों के बीच एक भयानक युद्ध हुआ और अंत में भगवान शिव उससे संतुष्ट हुए और अपनी पहचान बताई। अर्जुन ने पूर्ण विनम्रता से भगवान से प्रार्थना की, और भगवान उससे प्रसन्न होकर उसे पाशुपत अस्त्र प्रदान किया। उसने विभिन्न देवताओं से कई अन्य महत्वपूर्ण अस्त्र प्राप्त किए। उसे यमराज से दण्डास्त्र, वरुण से पाशास्त्र और स्वर्गलोक के कोषाध्यक्ष कुबेर से अंतरध्यानस्त्र मिला। इंद्रदेव चाहते थे कि वह इंद्रलोक, जो चंद्रलोक से आगे है, स्वर्गलोक जाएँ। उस ग्रह पर स्थानीय निवासियों ने उसका सौहार्दपूर्वक स्वागत किया और उसे इंद्रदेव की स्वर्गीय संसद में सम्मान दिया गया। फिर वह इंद्रदेव से मिले जिन्होंने न केवल उसे अपना वज्रास्त्र प्रदान किया, बल्कि उसे स्वर्गलोक में प्रयुक्त सैन्य और संगीत विज्ञान की शिक्षा भी दी। एक प्रकार से, इंद्र अर्जुन के असली पिता हैं और इसलिए वे परोक्ष रूप से अर्जुन का मनोरंजन स्वर्ग की प्रसिद्ध समाजिक लड़की, उर्वशी, जो एक विख्यात सुंदरी थी, से कराना चाहते थे। स्वर्ग की समाजिक लड़कियाँ कामुक होती हैं, और उर्वशी सबसे शक्तिशाली मानव अर्जुन से संपर्क करने के लिए बहुत उत्सुक थी। वह उनके कमरे में मिली और अपनी इच्छा व्यक्त की, परन्तु अर्जुन ने उर्वशी के सामने अपनी आँखें बंदकर, उन्हें कुरु वंश की माता कहकर और उन्हें अपनी माताओं कुंती, माдри और इंद्रदेव की पत्नी शचीदेवी के समकक्ष मानकर अपने अविचल चरित्र को बनाए रखा। निराश होकर उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया और चली गई। स्वर्गीय ग्रह में उसकी मुलाकात महान प्रसिद्ध तपस्वी लोमश से भी हुई और उसने महाराज युधिष्ठिर की सुरक्षा के लिए उससे प्रार्थना की।

जब उनके दुष्ट चचेरे भाई दुर्योधन गंधर्वों के चंगुल में थे, तो वह उन्हें बचाना चाहते थे और उन्होंने गंधर्वों से दुर्योधन को छोड़ने का अनुरोध किया पर गंधर्वों ने मना कर दिया और तब उन्होंने उनसे युद्ध किया और दुर्योधन को छुड़ा लिया। जब सभी पाण्डवों ने गुप्त रूप से रहा, तो उन्होंने राजा विराट के दरबार में नपुंसक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और उत्तरा को, अपनी भावी बहू को संगीत की शिक्षा देने के रूप में कार्यरत हुए, और विराट के दरबार में बृहन्नला के रूप में जाने जाने लगे। बृहन्नला के रूप में, उन्होंने राजा विराट के पुत्र, उत्तरा की ओर से युद्ध किया, और इस तरह से युद्ध में कौरवों को गुप्त रूप से हराया। उनके गुप्त हथियार एक सोम वृक्ष की सुरक्षित स्थिति में रखे गए थे, और उन्होंने उत्तरा को उन्हें वापस लाने का आदेश दिया। उनकी पहचान और उनके भाइयों की पहचान बाद में उत्तरा पर प्रकट की गई। द्रोणाचार्य को अर्जुन की मौजूदगी कौरवों के और विराटों के युद्ध में दी गई जानकारी मिली थी। बाद में, कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, अर्जुन ने कर्ण और अन्य जैसे कई महान सेनापतियों को मार डाला। कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद, उन्होंने अश्वत्थामा को दंडित किया, जिसने द्रौपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या कर दी थी। फिर सभी भाई भीष्मदेव के पास गए।

यह सिर्फ़ अर्जुन की वजह से था कि भगवद गीता के महान दार्शनिक वार्तालाप को एक बार फिर भगवान ने कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में कहा। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान पर उनकी अद्भुत हरकतों का वर्णन महाभारत में स्पष्ट रूप से किया गया है। अर्जुन को, हालाँकि, उनके पुत्र बभ्रुवाहन ने मणिपुर में हरा दिया और जब उलूपी ने उन्हें बचाया तो वह बेहोश हो गए। भगवान कृष्ण के लापता हो जाने के बाद, अर्जुन ने महाराज युधिष्ठिर के लिए संदेश पहुँचाया। फिर, अर्जुन ने द्वारका का दौरा किया, और भगवान कृष्ण की सभी विधवा पत्नियों ने उनके सामने शोक मनाया। वह उन सभी को वसुदेव के सामने ले गए और उन सभी को शांत किया। बाद में, जब वसुदेव का निधन हो गया, तो उन्होंने कृष्ण की अनुपस्थिति में उनके अंतिम संस्कार का आयोजन किया। जब अर्जुन कृष्ण की सभी पत्नियों को इंद्रप्रस्थ ले जा रहे थे, तो उन पर रास्ते में हमला हो गया, और वह अपनी हिरासत में महिलाओं की रक्षा नहीं कर सके। अंत में, व्यासदेव द्वारा दी गई सलाह पर, सभी भाई महाप्रस्थान की ओर चले। रास्ते में, अपने भाई के आग्रह पर, उन्होंने सभी महान हथियारों को बेकार समझते हुए त्याग दिया, और वह सभी को पानी में फेंक दिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)