श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 12: सम्राट परीक्षित का जन्म  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.12.19 
ब्राह्मणा ऊचु:
पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानव: ।
ब्रह्मण्य: सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यथा ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
विद्वान ब्राह्मणों ने कहा: हे पृथापुत्र, यह बालक मनु-पुत्र, राजा इक्ष्वाकु की तरह सभी प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला होगा। और जहां तक ब्राह्मणिक सिद्धांतों के पालन की बात है, विशेष रूप से अपने वचन का पालन करने में, यह महाराज दशरथ के पुत्र भगवान राम की तरह दृढ़ प्रतिज्ञ होगा।
 
The learned Brahmins said: O son of Pritha, this child will be a protector of all living beings like King Iksvaku, the son of Manu. And as far as the observance of Brahminical principles is concerned, especially in keeping his word, he will be like Lord Rama, the son of King Dasharatha.
तात्पर्य
प्रजा का अर्थ है वह जीव जिसने भौतिक संसार में जन्म लिया है। वास्तव में जीव का कोई जन्म नहीं और कोई मृत्यु नहीं होती है, लेकिन भगवान की सेवा से अलग होने और भौतिक प्रकृति पर अधिकार पाने की इच्छा के कारण, उसे अपनी भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए एक उपयुक्त शरीर दिया जाता है। ऐसा करते समय, वह भौतिक प्रकृति के नियमों से बंध जाता है, और भौतिक शरीर उसके अपने काम के अनुसार बदल जाता है। इस प्रकार जीवंत इकाई जीवन की 8,400,000 प्रजातियों में एक शरीर से दूसरे शरीर में चली जाती है। लेकिन भगवान का अभिन्न अंग होने के कारण, वह न केवल भगवान द्वारा जीवन की सभी आवश्यकताओं के साथ बनाए रखा जाता है, बल्कि भगवान और उनके प्रतिनिधियों, संत राजाओं द्वारा भी संरक्षित किया जाता है। ये संत राजा सभी प्रजाओं या जीवित प्राणियों को रहने और उनकी जेल की शर्तों को पूरा करने के लिए सुरक्षा प्रदान करते हैं। महाराजा परीक्षित वास्तव में एक आदर्श संत राजा थे क्योंकि अपने राज्य का भ्रमण करते समय उन्होंने देखा कि एक गरीब गाय को व्यक्तिकृत काली द्वारा मारा जाने वाला था, जिसे उन्होंने तुरंत एक हत्यारे के रूप में काम पर लिया। इसका मतलब यह है कि जानवरों को भी संत प्रशासकों द्वारा सुरक्षा दी जाती थी, किसी भावुक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि इसलिए कि जिन्होंने भौतिक दुनिया में जन्म लिया है उन्हें जीने का अधिकार है। सूर्य मंडल के राजा से लेकर पृथ्वी के राजा तक, सभी संत राजा वैदिक साहित्य के प्रभाव से इस तरह से प्रेरित हैं। वैदिक साहित्य को उच्च ग्रहों में भी पढ़ाया जाता है, जैसा कि भगवद-गीता (4.1) में सूर्य-देव (विवस्वान) को भगवान द्वारा दी गई शिक्षाओं का उल्लेख है, और इस तरह के पाठों को शिष्य उत्तराधिकार द्वारा स्थानांतरित किया जाता है, जैसा कि सूर्य-देव ने अपने बेटे मनु के लिए किया था। मनु से महाराजा इक्ष्वाकु को। ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं, और यहाँ उल्लिखित मनु सातवाँ मनु है, जो प्रजापतियों में से एक है (जो संतान पैदा करते हैं), और वह सूर्य-देव के पुत्र हैं। उन्हें वैवस्वत मनु के नाम से जाना जाता है। उनके दस पुत्र थे, और महाराजा इक्ष्वाकु उनमें से एक हैं। महाराजा इक्ष्वाकु ने भी भगवद-गीता में सिखाई गई भक्ति-योग को अपने पिता मनु से सीखा था, जिसे उन्होंने अपने पिता सूर्य-देव से प्राप्त किया था। बाद में भगवद-गीता की शिक्षा महाराजा इक्ष्वाकु से शिष्य उत्तराधिकार द्वारा नीचे आ गई, लेकिन समय के साथ श्रृंखला को बेईमान व्यक्तियों द्वारा तोड़ दिया गया, और इसलिए इसे फिर से कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान पर अर्जुन को पढ़ाना पड़ा। तो सभी वैदिक साहित्य भौतिक जगत के निर्माण की शुरुआत से ही प्रचलित हैं, और इस प्रकार वैदिक साहित्य को अपौरुषेय ("मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं") के रूप में जाना जाता है। वैदिक ज्ञान भगवान द्वारा बोला गया था और पहली बार ब्रह्मा ने सुना था, जो ब्रह्मांड के भीतर बनाए गए पहले जीवित प्राणी थे।

महाराजा इक्ष्वाकु: वैवस्वत मनु के पुत्रों में से एक। उनके सौ पुत्र थे। उन्होंने मांस खाने पर मनाही लगा दी। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र शंशाडा अगले राजा बने।

मनु: इक्ष्वाकु के पिता के रूप में इस श्लोक में उल्लिखित मनु सातवाँ मनु हैं, वैवस्वत मनु के नाम से, सूर्य-देव विवस्वान के पुत्र, जिन्हें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाने से पहले भगवद-गीता की शिक्षाओं का निर्देश दिया। मानव जाति मनु की वंशज है। इस वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे, जिनके नाम इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरष्यंत, नभागा, दिश्ट, करुष, पृषध्र और वसुमान थे। भगवान का अवतार मत्स्य (विशालकाय मछली) वैवस्वत मनु के शासनकाल की शुरुआत में प्रकट हुआ था। उन्होंने अपने पिता, विवस्वान, सूर्य-देव से भगवद-गीता के सिद्धांतों को सीखा, और उन्होंने वही अपने पुत्र महाराजा इक्ष्वाकु को फिर से निर्देश दिया। त्रेता-युग की शुरुआत में सूर्य-देव ने मनु को भक्ति सेवा का निर्देश दिया, और मनु ने बदले में पूरे मानव समाज के कल्याण के लिए इक्ष्वाकु को इसका निर्देश दिया।

भगवान राम : भगवान ने स्वयं भगवान श्री राम के रूप में अवतार लिया और अयोध्या के राजा महाराजा दशरथ जोकि उनके शुद्ध भक्त थे, के पुत्रत्व को स्वीकार किया। भगवान राम अपने पूर्णावतारों के साथ उतरे और वे सभी उनके छोटे भाइयों के रूप में प्रकट हुए। त्रेता युग में चैत्र महीने में नवमी तिथि को, भगवान प्रकट हुए, जैसा कि वे हमेशा करते थे, धर्म के सिद्धांतों को स्थापित करने और विध्वंसक तत्वों को नष्ट करने के लिए। जब वे मात्र एक छोटे बालक थे, तब उन्होंने मारीच और सुबाहु नामक राक्षस जोकि ऋषियों को अपने दैनिक कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डाल रहे थे उन्हें मारकर महान ऋषि विश्वामित्र की सहायता की। ब्राह्मण और क्षत्रिय जन-समुदाय के कल्याण के लिए सहयोग करने के लिए बनाए गए हैं। ब्राह्मण ऋषि लोगों को पूर्ण ज्ञान द्वारा प्रबुद्ध करने का प्रयास करते हैं, और क्षत्रिय उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। भगवान रामचंद्र मानवता के सर्वोच्च संस्कृति के संरक्षण और पालन के लिए आदर्श राजा हैं, जिसे ब्रह्मण्य-धर्म के रूप में जाना जाता है। भगवान विशेष रूप से गायों और ब्राह्मणों के रक्षक हैं, और इसलिए वे दुनिया की समृद्धि को बढ़ाते हैं। उन्होंने विश्वामित्र के माध्यम से राक्षसों को जीतने के लिए प्रभावी हथियार देकर प्रशासनिक देवताओं को पुरस्कृत किया। वे राजा जनक के धनु यज्ञ में उपस्थित थे, और शिव के अजेय धनु को तोड़कर, उन्होंने महाराजा जनक की बेटी सीतादेवी से विवाह किया। अपने विवाह के बाद उन्होंने अपने पिता महाराजा दशरथ के आदेश पर चौदह वर्षों के लिए वनवास स्वीकार किया। देवताओं के प्रशासन में सहायता करने के लिए, उन्होंने चौदह हजार राक्षसों को मार डाला और राक्षसों की साजिश के कारण उनकी पत्नी सीतादेवी का अपहरण रावण ने किया। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की जिन्हें भगवान ने सुग्रीव के भाई वाली को मारने में मदद की। भगवान राम की मदद से, सुग्रीव वानरों (गोरिल्ला की एक जाति) के राजा बने। प्रभु ने हिंद महासागर पर पत्थरों का एक तैरता हुआ पुल बनाया और सीता का अपहरण करने वाले रावण के राज्य लंका पहुंचे। बाद में रावण को उनके द्वारा मार दिया गया, और रावण के भाई विभीषण को लंका के सिंहासन पर स्थापित किया गया। विभीषण रावण का भाई था जो राक्षस था, लेकिन भगवान राम ने उन्हें अपने आशीर्वाद से अमर बना दिया। लंका में मामलों को निपटाने के बाद चौदह वर्ष की समाप्ति पर, भगवान अपने राज्य अयोध्या में पुष्पक विमान से वापस लौट आए। उन्होंने अपने भाई शत्रुघ्न को लवणा असुर पर हमला करने का निर्देश दिया, जो मथुरा में राज करते थे और दानव मारा गया था। उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञ किए और इसके बाद सरयू नदी में स्नान करते समय वे गायब हो गए। महाकाव्य रामायण दुनिया में भगवान राम की गतिविधियों का इतिहास है, और प्रामाणिक रामायण महान कवि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)