महाराजा इक्ष्वाकु: वैवस्वत मनु के पुत्रों में से एक। उनके सौ पुत्र थे। उन्होंने मांस खाने पर मनाही लगा दी। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र शंशाडा अगले राजा बने।
मनु: इक्ष्वाकु के पिता के रूप में इस श्लोक में उल्लिखित मनु सातवाँ मनु हैं, वैवस्वत मनु के नाम से, सूर्य-देव विवस्वान के पुत्र, जिन्हें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाने से पहले भगवद-गीता की शिक्षाओं का निर्देश दिया। मानव जाति मनु की वंशज है। इस वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे, जिनके नाम इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरष्यंत, नभागा, दिश्ट, करुष, पृषध्र और वसुमान थे। भगवान का अवतार मत्स्य (विशालकाय मछली) वैवस्वत मनु के शासनकाल की शुरुआत में प्रकट हुआ था। उन्होंने अपने पिता, विवस्वान, सूर्य-देव से भगवद-गीता के सिद्धांतों को सीखा, और उन्होंने वही अपने पुत्र महाराजा इक्ष्वाकु को फिर से निर्देश दिया। त्रेता-युग की शुरुआत में सूर्य-देव ने मनु को भक्ति सेवा का निर्देश दिया, और मनु ने बदले में पूरे मानव समाज के कल्याण के लिए इक्ष्वाकु को इसका निर्देश दिया।
भगवान राम : भगवान ने स्वयं भगवान श्री राम के रूप में अवतार लिया और अयोध्या के राजा महाराजा दशरथ जोकि उनके शुद्ध भक्त थे, के पुत्रत्व को स्वीकार किया। भगवान राम अपने पूर्णावतारों के साथ उतरे और वे सभी उनके छोटे भाइयों के रूप में प्रकट हुए। त्रेता युग में चैत्र महीने में नवमी तिथि को, भगवान प्रकट हुए, जैसा कि वे हमेशा करते थे, धर्म के सिद्धांतों को स्थापित करने और विध्वंसक तत्वों को नष्ट करने के लिए। जब वे मात्र एक छोटे बालक थे, तब उन्होंने मारीच और सुबाहु नामक राक्षस जोकि ऋषियों को अपने दैनिक कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा डाल रहे थे उन्हें मारकर महान ऋषि विश्वामित्र की सहायता की। ब्राह्मण और क्षत्रिय जन-समुदाय के कल्याण के लिए सहयोग करने के लिए बनाए गए हैं। ब्राह्मण ऋषि लोगों को पूर्ण ज्ञान द्वारा प्रबुद्ध करने का प्रयास करते हैं, और क्षत्रिय उनकी सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। भगवान रामचंद्र मानवता के सर्वोच्च संस्कृति के संरक्षण और पालन के लिए आदर्श राजा हैं, जिसे ब्रह्मण्य-धर्म के रूप में जाना जाता है। भगवान विशेष रूप से गायों और ब्राह्मणों के रक्षक हैं, और इसलिए वे दुनिया की समृद्धि को बढ़ाते हैं। उन्होंने विश्वामित्र के माध्यम से राक्षसों को जीतने के लिए प्रभावी हथियार देकर प्रशासनिक देवताओं को पुरस्कृत किया। वे राजा जनक के धनु यज्ञ में उपस्थित थे, और शिव के अजेय धनु को तोड़कर, उन्होंने महाराजा जनक की बेटी सीतादेवी से विवाह किया। अपने विवाह के बाद उन्होंने अपने पिता महाराजा दशरथ के आदेश पर चौदह वर्षों के लिए वनवास स्वीकार किया। देवताओं के प्रशासन में सहायता करने के लिए, उन्होंने चौदह हजार राक्षसों को मार डाला और राक्षसों की साजिश के कारण उनकी पत्नी सीतादेवी का अपहरण रावण ने किया। उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की जिन्हें भगवान ने सुग्रीव के भाई वाली को मारने में मदद की। भगवान राम की मदद से, सुग्रीव वानरों (गोरिल्ला की एक जाति) के राजा बने। प्रभु ने हिंद महासागर पर पत्थरों का एक तैरता हुआ पुल बनाया और सीता का अपहरण करने वाले रावण के राज्य लंका पहुंचे। बाद में रावण को उनके द्वारा मार दिया गया, और रावण के भाई विभीषण को लंका के सिंहासन पर स्थापित किया गया। विभीषण रावण का भाई था जो राक्षस था, लेकिन भगवान राम ने उन्हें अपने आशीर्वाद से अमर बना दिया। लंका में मामलों को निपटाने के बाद चौदह वर्ष की समाप्ति पर, भगवान अपने राज्य अयोध्या में पुष्पक विमान से वापस लौट आए। उन्होंने अपने भाई शत्रुघ्न को लवणा असुर पर हमला करने का निर्देश दिया, जो मथुरा में राज करते थे और दानव मारा गया था। उन्होंने दस अश्वमेध यज्ञ किए और इसके बाद सरयू नदी में स्नान करते समय वे गायब हो गए। महाकाव्य रामायण दुनिया में भगवान राम की गतिविधियों का इतिहास है, और प्रामाणिक रामायण महान कवि वाल्मीकि द्वारा लिखा गया था।
