श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.11.9 
यर्ह्यम्बुजाक्षापससार भो भवान्
कुरून् मधून् वाथ सुहृद्दिद‍ृक्षया ।
तत्राब्दकोटिप्रतिम: क्षणो भवेद्
रविं विनाक्ष्णोरिव नस्तवाच्युत ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
हे कमलनयन भगवान्, जब भी आप अपने मित्रों और संबंधियों से मिलने मथुरा-वृंदावन या हस्तिनापुर जाते हैं, तो आपकी अनुपस्थिति में हर पल हमें करोड़ों वर्षों के बराबर लगता है। हे अच्युत, उस समय हमारी आँखें बेकार हो जाती हैं, मानो वे सूर्य से वंचित हो गई हों।
 
O lotus-eyed Lord, whenever You go to Mathura, Vrindavan or Hastinapur to meet Your friends and relatives, each moment in Your absence seems like millions of years to us. O infallible one, at that time our eyes become useless as if they were separated from the sun.
तात्पर्य
हम सभी ईश्वर के अस्तित्व को निर्धारित करने के लिए प्रयोग करने के लिए अपने भौतिक ज्ञानों पर गर्व करते हैं। लेकिन हम भूल जाते हैं कि हमारी इंद्रियाँ स्वयं में पूर्ण नहीं हैं। वे केवल कुछ निश्चित स्थितियों के तहत ही कार्य कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, हमारी आंखें। जब तक धूप रहती है, हमारी आंखें कुछ हद तक उपयोगी होती हैं। लेकिन धूप के अभाव में आंखें बेकार होती हैं। प्रथम प्रभु, परम सत्य होने के नाते प्रभु श्रीकृष्ण की तुलना सूर्य से की जाती है। उनके बिना हमारा सारा ज्ञान या तो झूठा है या आंशिक। सूर्य के विपरीत अंधकार है, और इसी तरह कृष्ण के विपरीत माया या भ्रम है। प्रभु के भक्त भगवान कृष्ण द्वारा प्रसारित प्रकाश के कारण हर चीज को सही दृष्टिकोण से देख सकते हैं। प्रभु की कृपा से शुद्ध भक्त अज्ञान के अंधकार में नहीं रह सकता। इसलिए, यह आवश्यक है कि हम हमेशा भगवान कृष्ण की दृष्टि में रहें ताकि हम स्वयं को और भगवान को उनकी विभिन्न ऊर्जाओं के साथ देख सकें। जैसा कि हम सूर्य के अभाव में कुछ भी नहीं देख सकते हैं, वैसे ही हम अपने स्वयं के बिना कुछ भी नहीं देख सकते हैं, भगवान की वास्तविक उपस्थिति के बिना। उनके बिना हमारा सारा ज्ञान भ्रम से ढका हुआ है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)