यद्यपि रानियों की सुन्दर मुस्कान और चोरी छिपे इशारे सब निष्कलंक और उत्तेजक थे, जिससे कामदेव भी मंत्रमुग्ध होकर अपना धनुष त्यागने को मजबूर हो सकता था, यहाँ तक कि सबसे अधिक सहिष्णु शिवजी भी उनके शिकार हो सकते थे, तो भी, अपने सभी जादुई करतबों और आकर्षण के बावजूद, वे भगवान की इंद्रियों को विचलित नहीं कर सकीं।
Although the queens' sweet smiles and their beguiling glances were so pure and arousing that even God of love could be enticed and forced to drop his bow, even the most tolerant Lord Shiva could fall prey to them, yet they could not disturb the senses of the Lord with all their gestures and attraction.
तात्पर्य
मुक्ति का मार्ग या भगवान के पास वापस जाने वाला मार्ग हमेशा स्त्रियों के संग को निषेधित करता है, और पूरा सनातन धर्म या वर्णाश्रम धर्म योजना स्त्रियों से संग को निषेधित या प्रतिबंधित करता है। तो फिर उसे कैसे भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के रूप में स्वीकार किया जा सकता है जो सोलह हजार से ज्यादा पत्नियों का आदी है? यह प्रश्न वास्तव में भगवान के दिव्य स्वरूप को जानने के इच्छुक व्यक्ति पूछ सकते हैं। और ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने के लिए, नैमिषारण्य के ऋषियों ने इस और आने वाले छंदों में भगवान के दिव्य स्वरूप पर चर्चा की है। यहाँ समझ लीजिए कि वो स्त्रीलिंग विशेषताएं जो कामदेव या अति सहनशील भगवान शिव को भी जीत सकती हैं, वो भगवान की इंद्रियों को नहीं जीत सकीं। कामदेव का काम सांसारिक वासना को जगाना है। पूरा ब्रह्मांड कामदेव के बाण के साथ चल रहा है, उससे परेशान है। दुनिया के काम पुरुष और स्त्री के केंद्रीय आकर्षण द्वारा चल रहे हैं। एक पुरुष अपनी पसंद के हिसाब से एक साथी की तलाश में है, और स्त्री एक उपयुक्त पुरुष की तलाश में है। वही सांसारिक उत्तेजन का रास्ता है। और जैसे ही एक पुरुष और स्त्री एक साथ आते हैं, जीवित प्राणी का सांसारिक बंधन सेक्स रिलेशन के साथ एकदम कसकर जकड़ जाता है, और इसके नतीजे के रूप में, पुरुष और स्त्री दोनों का मीठे घर, मातृभूमि, शारीरिक संतान, समाज और दोस्ती और धन के जमाव के लिए आकर्षण भ्रमपूर्ण गतिविधियों का मैदान बन जाता है, और इस तरह अस्थायी सांसारिक अस्तित्व के लिए एक झूठा लेकिन लगातार चलने वाला आकर्षण, जो दुखों से भरा है, प्रकट होता है। वो लोग जो मुक्ति मार्ग पर हैं और भगवान के पास घर लौटने के लिए हैं, उन्हें खास तौर पर सभी धर्मग्रंथों के निर्देशों के साथ इस सांसारिक आकर्षण के ऐसे सामान से मुक्त होने की सलाह दी जाती है। और वो केवल भगवान के भक्तों के संग से ही संभव है, जिन्हें महात्मा कहा जाता है। कामदेव अपने बाण जीवित प्राणियों पर फेंकता है ताकि उन्हें विपरीत सेक्स के पीछे पागल कर दे, फिर चाहे वो पार्टी वास्तव में खूबसूरत हो या न हो। कामदेव के उकसावे पाशविक समाजों में भी चलते रहते हैं जो सभी सभ्य राष्ट्रों के लिए बदसूरत दिखने वाले होते हैं। इस तरह कामदेव का प्रभाव बदसूरत रूपों में भी बना रहता है, और सबसे खूबसूरत सुंदरियों का क्या कहना है। भगवान शिव, जिन्हें सबसे सहनशील माना जाता है, वो भी कामदेव के बाण से आहत हुए थे क्योंकि वो भी भगवान के मोहिनी अवतार के पीछे दीवाने हो गए और खुद को हारा हुआ माना। हालाँकि, कामदेव खुद भाग्य की देवियों के भारी और उत्तेजक व्यवहार से वशीभूत हो गया, और उसने निराशा की भावना से खुद ही अपने धनुष और बाण छोड़ दिए। ऐसी थी भगवान कृष्ण की रानियों की खूबसूरती और आकर्षण। फिर भी वो भगवान की दिव्य इंद्रियों को परेशान नहीं कर सकीं। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान पूरे परिपूर्ण आत्मराम या स्व-संतुष्ट हैं। उन्हें अपनी व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं है। इसलिए, रानियाँ भगवान को अपने स्त्रीलिंग आकर्षण से संतुष्ट नहीं कर सकीं, बल्कि उन्होंने उन्हें अपने सच्चे स्नेह और सेवा से संतुष्ट किया। केवल निस्वार्थ दिव्य प्रेम सेवा से ही वो भगवान को संतुष्ट कर सकीं, और भगवान उन्हें पत्नियों के साथ व्यवहार करने के लिए प्रसन्न हुए। इस तरह केवल उनकी निस्वार्थ सेवा से संतुष्ट होकर, भगवान ने एक भक्तिमान पति की तरह ही सेवा का बदला दिया। नहीं तो उनके लिए इतनी सारी पत्नियों का पति बनने का कोई काम नहीं था। वो हर किसी के पति हैं, लेकिन जो उन्हें ऐसा स्वीकार करते हैं, उन्हें वो बदला देते हैं। भगवान के लिए यह निस्वार्थ स्नेह कभी भी सांसारिक वासना से तुलना नहीं की जा सकती। यह पूरी तरह से दिव्य है। और भारी व्यवहार, जो रानियों ने प्राकृतिक स्त्रीलिंग तरीकों से दिखाए, वो भी दिव्य थे क्योंकि भावनाएं दिव्य परमानंद से व्यक्त की गई थीं। पिछले छंद में पहले ही समझाया गया है कि भगवान एक सांसारिक पति की तरह दिखे, लेकिन वास्तव में उनकी अपनी पत्नियों के साथ उनका रिश्ता दिव्य, शुद्ध और भौतिक प्रकृति के तरीकों से बिना शर्त के था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥