श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  1.11.35 
स एष नरलोकेऽस्मिन्नवतीर्ण: स्वमायया ।
रेमे स्त्रीरत्नकूटस्थो भगवान् प्राकृतो यथा ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण अपनी निष्काम दया से अपनी आंतरिक शक्ति के द्वारा इस पृथ्वी पर अवतरित हुए और उपयुक्त महिलाओं के साथ आनंदमय जीवन व्यतीत किया, मानों वे सांसारिक कार्यों में लगे हों।
 
The Supreme Personality of Godhead, Sri Krishna, by His causeless grace, appeared in this world through His intrinsic potency and enjoyed the company of suitable women as if He were engaged in worldly activities.
तात्पर्य
भगवान विवाह करके और एक गृहस्थ व्यक्ति की तरह रहते थे। यह निश्चित रूप से एक सांसारिक मामला है, पर जब हम जानते हैं कि उसने 16,108 पत्नियां लाई थीं और उनके साथ हर एक महल में अलग - अलग रहते थे, तो निश्चित रूप से यह सांसारिक नहीं है। इसलिए, उनके सक्षम पत्नियों के बीच एक गृहस्थ के रूप में रहते हुए भगवान कभी सांसारिक नहीं होते हैं, और उनके साथ उनका व्यवहार कभी भी सांसारिक यौन संबंध के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। जो महिलाएं भगवान के पत्नियां बनीं, वे निश्चित रूप से सामान्य महिलाएं नहीं हैं, क्योंकि भगवान को अपने पति के रूप में पाना कई, कई लाखों जन्मों के तपस्या का परिणाम है। जब भगवान विभिन्न लोकों या ग्रहों में या इस मानव ग्रह पर आते हैं, तो वह अपने पारलौकिक समयों को आकर्षित करने के लिए प्रदर्शित करते हैं ताकि वहां की आत्माओं को उनके अनन्त सेवक, दोस्त, माता - पिता और प्रेमियों को आकर्षित किया जा सके। पारलौकिक दुनिया में, जहां भगवान अनन्त रूप से सेवाओं के ऐसे आदान - प्रदान का पारस्परिक रूप से जवाब देते हैं। सेवा को भौतिक दुनिया में खराब तरीके से दर्शाया गया है और असामयिक रूप से टूट गया, जिसके परिणामस्वरूप दुख का अनुभव होता है। भौतिक प्रकृति से वातानुकूलित भ्रमित जीव अज्ञानता से यह नहीं समझ सकते हैं कि सांसारिक दुनिया में हमारे सभी संबंध अस्थायी हैं और जहरीलेपन से भरे हैं। इस तरह के रिश्ते हमें हमेशा खुश रहने में मदद नहीं कर सकते हैं, लेकिन अगर भगवान के साथ एक ही रिश्ता स्थापित किया जाता है, तो इस भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद हमें हस्तांतरित कर दिया जाता है और हम उस संबंध में हमेशा के लिए उनके साथ संबंधित हो जाते हैं जिसे हम चाहते हैं। जिन महिलाओं के बीच वे अपने पति के रूप में रहते थे, वे इसलिए, इस सांसारिक दुनिया की महिलाएं नहीं हैं, लेकिन हमेशा के लिए उनके साथ पारलौकिक पत्नियों के रूप में संबंधित हैं, जो कि एक ऐसी स्थिति है जिसे उन्होंने भक्ति सेवा की पूर्णता के द्वारा प्राप्त किया था। यही उनकी योग्यता है। भगवान परब्रह्म है, या भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व। वातानुकूलित आत्माएं सभी जगहों पर सतत खुशी की तलाश करती हैं - न केवल इस धरती पर बल्कि ब्रह्मांड में अन्य ग्रहों पर भी - क्योंकि संवैधानिक रूप से एक आध्यात्मिक चिंगारी है, जैसा कि वह है, भगवान की सृष्टि के किसी भी हिस्से में यात्रा कर सकता है। लेकिन भौतिक तरीकों से वातानुकूलित होने के कारण, वह अंतरिक्ष यान से अंतरिक्ष में यात्रा करने की कोशिश करता है और इसलिए अपने गंतव्य तक पहुंचने में विफल रहता है। गुरुत्वाकर्षण का नियम उस पर एक कैदी की झोंपड़ियों की तरह बाध्य है। अन्य प्रक्रियाओं से वह कहीं भी पहुंच सकता है, लेकिन अगर वह उच्चतम ग्रह तक पहुंचता है, तब भी वह उस सतत खुशी को प्राप्त नहीं कर सकता है जिसके लिए वह जीवन भर खोज कर रहा है। हालाँकि, जब वह अपने होश में आता है, तो वह ब्रह्म की खुशी की खोज करता है, यह जानते हुए कि निश्चित रूप से असीमित खुशी, जिसकी वह तलाश कर रहा है, वह कभी भी भौतिक दुनिया में प्राप्य नहीं है। जैसे कि, सर्वोच्च व्यक्ति, परब्रह्म, निश्चित रूप से भौतिक दुनिया में कहीं भी अपनी खुशी की तलाश नहीं करता है। न ही भौतिक दुनिया में उनकी खुशी का सामान मिल सकता है। वह अवैयक्तिक नहीं है। क्योंकि वह अनगिनत जीवों के बीच नेता और सर्वोच्च है, वह अवैयक्तिक नहीं हो सकता है। वह बिल्कुल हमारे जैसा है, और उसके पास एक व्यक्तिगत जीव के सभी प्रचार पूर्ण रूप से हैं। वह बिल्कुल हमारे जैसा विवाह करते हैं, लेकिन उनका विवाह न तो सांसारिक है और न ही हमारे अनुभव से वातानुकूलित अवस्था में सीमित है। इसलिए, उनकी पत्नियां सांसारिक महिलाओं की तरह दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तव में वे सभी पारलौकिक मुक्त आत्माएं हैं, आंतरिक ऊर्जा की पूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)