श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 11: भगवान् श्रीकृष्ण का द्वारका में प्रवेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.11.33 
यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगत-
स्तथापि तस्याङ्‌घ्रियुगं नवं नवम् ।
पदे पदे का विरमेत तत्पदा-
च्चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि भगवान श्री कृष्ण हमेशा उनके बगल में थे और कभी-कभी अकेले भी थे, लेकिन उनके चरण उन्हें हमेशा नये और अनोखे लगते थे। लक्ष्मी जी, जो स्वभाव से अत्यंत चंचल हैं, वे भी भगवान के चरणों को नहीं छोड़ती थीं। तो ऐसी स्त्री, जिसने एक बार उनके चरणों का आश्रय ले लिया है, उसे उनसे दूर कैसे किया जा सकता है?
 
Although Lord Krishna was always near her and even when she was completely alone, still his feet seemed fresher to her. Although Goddess Lakshmi is fickle by nature, she too would not leave the feet of the Lord. So how can a woman who has once taken refuge in those feet be separated from them?
तात्पर्य
सशर्त जीव हमेशा भाग्य की देवी के अनुग्रह की खोज में रहते हैं, यद्यपि वह स्वभाव से एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करती रहती हैं। भौतिक जगत में कोई भी स्थायी रूप से भाग्यशाली नहीं होता, चाहे वह कितना भी चतुर क्यों न हो। विश्व के विभिन्न भागों में बहुत से बड़े साम्राज्य रहे हैं, विश्व भर में बहुत से शक्तिशाली राजा रहे हैं, और बहुत से भाग्यशाली पुरुष हुए हैं, लेकिन वे सभी धीरे-धीरे नष्ट हो गए हैं। यही भौतिक प्रकृति का नियम है। लेकिन आध्यात्मिक रूप से यह भिन्न है। ब्रह्म-संहिता के अनुसार, भगवान की सैकड़ों और हजारों भाग्य की देवियाँ बहुत सम्मानपूर्वक सेवा करती हैं। वे भगवान के साथ एकांत स्थान पर भी रहती हैं। लेकिन फिर भी भगवान का संग इतना प्रेरणादायक होता जाता है कि वे एक क्षण के लिए भी भगवान को नहीं छोड़ सकतीं, यद्यपि वे स्वभाव से बहुत चंचल हैं और इधर-उधर भ्रमण करती रहती हैं। भगवान के साथ आध्यात्मिक संबंध इतना जीवंत और संसाधन संपन्न होता है कि भगवान का आश्रय लेने के बाद कोई भी व्यक्ति उनकी संगति नहीं छोड़ सकता है। जीव संविधान से स्त्री प्रकृति के होते हैं। पुरुष या उपभोक्ता भगवान है, और उनकी विभिन्न शक्तियों की सभी अभिव्यक्तियाँ प्रकृति से स्त्रीलिंग होती हैं। भगवद-गीता में, जीवों को परा-प्रकृति या श्रेष्ठ शक्ति के रूप में नामित किया गया है। भौतिक तत्व अपरा-प्रकृति या निम्न शक्ति हैं। ऐसी शक्तियाँ हमेशा नियोक्ता या उपभोक्ता की संतुष्टि के लिए नियोजित की जाती हैं। भगवद-गीता (5.29) में बताए अनुसार, सर्वोच्च उपभोक्ता स्वयं भगवान हैं। इसलिए, जब शक्तियों को सीधे भगवान की सेवा में लगाया जाता है, तो उनका प्राकृतिक रंग पुनर्जीवित हो जाता है, और इस प्रकार शक्ति और शक्ति में कोई असमानता नहीं रहती। सामान्यतः, सेवा में लगे लोग हमेशा सरकार या राज्य के सर्वोच्च उपभोक्ता के अधीन कोई पद तलाशते रहते हैं। चूँकि भगवान ब्रह्मांड के भीतर या बाहर की हर चीज़ के सर्वोच्च उपभोक्ता हैं, इसलिए उनके द्वारा नियोजित होना सुखद है। भगवान की सर्वोच्च सरकारी सेवा में एक बार नियुक्त हो जाने पर, कोई भी जीव उस जुड़ाव से मुक्त होने की इच्छा नहीं करता है। मानव जीवन की उच्चतम सिद्धि भगवान की सर्वोच्च सेवा के अधीन कुछ रोजगार की तलाश करना है। इससे वह अत्यंत सुखी हो जाएगा। भगवान के संबंध के बिना किसी को भाग्य की अस्थिर देवी की तलाश नहीं करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)