श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 10: द्वारका के लिए भगवान् कृष्ण का प्रस्थान  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.10.25 
यदा ह्यधर्मेण तमोधियो नृपा
जीवन्ति तत्रैष हि सत्त्वत: किल ।
धत्ते भगं सत्यमृतं दयां यशो
भवाय रूपाणि दधद्युगे युगे ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
जब भी राजा और प्रशासक जानवरों की तरह निम्नतम स्तर पर रहते हैं, तो भगवान अपने दिव्य स्वरूप में अपनी परम शक्ति, सत्य और ऋत को प्रकट करते हैं। वो श्रद्धालुओं पर विशेष दया दिखाते हैं, अद्भुत कार्यों का प्रदर्शन करते हैं और विभिन्न काल और युगों की आवश्यकता के अनुसार कई दिव्य रूप प्रकट करते हैं।
 
Whenever kings and administrators live like animals situated in the mode of ignorance, the Lord in His divine form reveals His supreme power, the true rta, shows special mercy to the devotees, performs wonderful activities and manifests various divine forms as per the need in different times and ages.
तात्पर्य
जैसा कि ऊपर बताया गया है, ब्रह्मांड का निर्माण भगवान के अधिकार के अधीन है। यही Īśopaniṣad का मूल दर्शन है: हर चीज सर्वोच्च सत्ता के अधिकार के अधीन है। किसी को भी सर्वोच्च भगवान के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। व्यक्ति को केवल वही स्वीकार करना चाहिए जो उसके द्वारा कृपा पूर्वक दिया गया हो। इसलिए, पृथ्वी या कोई अन्य ग्रह या ब्रह्मांड भगवान की абсолютной संपत्ति है। जीव निश्चित रूप से उसके भाग हैं, या पुत्र हैं, और इस प्रकार उनमें से प्रत्येक को अपने निर्धारित कार्य को निष्पादित करने के लिए भगवान की दया पर जीने का अधिकार है। इसलिए, कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या पशु के अधिकारों का उल्लंघन तब तक नहीं कर सकता, जब तक कि भगवान द्वारा उसकी अनुमति न दी गई हो। राजा या प्रशासक भगवान के इच्छा प्रबंधन को संभालने का प्रतिनिधि है। इसलिए उसे महाराजा युधिष्ठिर या परीक्षित जैसे मान्यता प्राप्त व्यक्ति होना चाहिए। ऐसे राजाओं के पास दुनिया के प्रशासन के बारे में पूर्ण ज़िम्मेदारी और जानकारी होती है। लेकिन कभी-कभी, भौतिक प्रकृति (तमो-गुणा) के अज्ञान मोड के प्रभाव के कारण, भौतिक तरीकों में सबसे निचला मोड होने के कारण, राजा और प्रशासक ज्ञान और ज़िम्मेदारी के बिना सत्ता में आ जाते हैं, और ऐसे मूर्ख प्रशासक केवल अपने निजी हित के लिए जानवरों की तरह जीते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि पूरा माहौल अराजकता और दुष्ट तत्वों से भर जाता है। भाई-भतीजावाद, रिश्वत, धोखाधड़ी, आक्रामकता और इसलिए, भूखमरी, महामारी, युद्ध और मानव समाज में ऐसी ही अन्य परेशान करने वाली विशेषताएँ प्रमुख हो जाती हैं। और भगवान के भक्तों या वफादारों को हर तरह से सताया जाता है। ये सभी लक्षण धर्म के सिद्धांतों को फिर से स्थापित करने और कुप्रबंधकों को जीतने के लिए भगवान के अवतार के समय का संकेत देते हैं। इसकी पुष्टि भगवद् गीता में भी की गई है।

तब भगवान भौतिक गुणों के किसी भी रंग के बिना अपने दिव्य रूप में प्रकट होते हैं। वह सिर्फ अपनी रचना की स्थिति को सामान्य स्थिति में रखने के लिए उतरते हैं। सामान्य स्थिति यह है कि भगवान ने प्रत्येक ग्रह को मूल निवासी जीवों की सभी ज़रूरतों के साथ प्रदान किया है। प्रकट शास्त्रों में बताए गए नियमों और विनियमों का पालन करते हुए, वे खुशी से जी सकते हैं और अंत में मोक्ष प्राप्त करने के लिए अपने पूर्वनिर्धारित व्यवसायों का निष्पादन कर सकते हैं। भौतिक दुनिया नित्य-बद्ध या सनातन रूप से वातानुकूलित आत्माओं की इच्छाओं को संतुष्ट करने के लिए बनाई गई है, जैसे नटखट लड़कों को खेलने के लिए पालने दिए जाते हैं। अन्यथा भौतिक दुनिया की कोई ज़रूरत नहीं थी। लेकिन जब वे भगवान की मंजूरी के बिना गैरकानूनी रूप से संसाधनों का दोहन करने के लिए भौतिक विज्ञान की शक्ति के नशे में हो जाते हैं, और वह भी केवल इंद्रिय संतुष्टि के लिए, विद्रोहियों को दंडित करने और वफादारों की रक्षा के लिए भगवान के अवतार की आवश्यकता होती है।

जब वह उतरते हैं, तो वह अपने सर्वोच्च अधिकार को साबित करने के लिए अलौकिक कार्य करते हैं, और रावण, हिरण्यकशिपु और कंस जैसे भौतिकवादी पर्याप्त रूप से दंडित होते हैं। वह ऐसे तरीके से कार्य करते हैं जिसकी कोई नकल नहीं कर सकता है। उदाहरण के लिए, भगवान, जब वह राम के रूप में प्रकट हुए, ने हिंद महासागर को पाट दिया। जब वे कृष्ण के रूप में प्रकट हुए, तो उनके बचपन से ही उन्होंने पूतना, अघासुर, शकटासुर, कालिया, आदि को मारकर अलौकिक गतिविधियाँ दिखाईं, और फिर उनकी माँ के चाचा कंस को मार डाला। जब वह द्वारका में थे, उन्होंने १६,१०८ रानियों से शादी की, और उन सभी को पर्याप्त संख्या में बच्चे मिले। उनके व्यक्तिगत परिवार के सदस्यों की कुल संख्या लगभग १००,००० थी, जिन्हें लोकप्रिय रूप से यदु-वंश के नाम से जाना जाता था। और फिर, अपने जीवनकाल में, वह उन सभी को जीतने में कामयाब रहे। वह गोवर्धन-धारण हरि के रूप में प्रसिद्ध हैं क्योंकि उन्होंने केवल सात साल की उम्र में गोवर्धन नामक पहाड़ी को उठाया था। भगवान ने अपने समय में कई अवांछित राजाओं को मार डाला, और एक क्षत्रिय के रूप में उन्होंने बहादुरी से लड़ाई लड़ी। वह असमर्थ के रूप में प्रसिद्ध हैं, अद्वितीय। कोई भी उसके बराबर या उससे बड़ा नहीं है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)