अन्योन्यमासीत्सञ्जल्प उत्तमश्लोकचेतसाम् ।
कौरवेन्द्रपुरस्त्रीणां सर्वश्रुतिमनोहर: ॥ २० ॥
अनुवाद
चुने हुए श्लोकों में जिनका गुणगान किया जाता है, ऐसे भगवान के दिव्य गुणों के विचार में डूबीं, हस्तिनापुर के सभी घरों की छतों पर चढ़ी स्त्रियाँ, उनके विषय में बातचीत करने लगीं। उनकी ये बातें वैदिक स्तोत्रों से कहीं अधिक आकर्षक थीं।
Immersed in the thought of the transcendental qualities of the Lord who is praised in the selected verses, the women on the roofs of all the houses of Hastinapur began to talk about Him. These talks were far more attractive than the Vedic hymns.
तात्पर्य
भगवद्-गीता में कहा गया है कि सभी वैदिक साहित्य का लक्ष्य भगवान का व्यक्तित्व है, श्री कृष्ण। वास्तव में भगवान की महिमा वेद, रामायण और महाभारत जैसे साहित्य में दर्शायी गयी है। और भागवतम में उन्हें विशेष रूप से परम भगवान के संदर्भ में उल्लेख किया गया है। इसलिए, कुरु वंश के राजाओं की राजधानी के घरों की छतों पर जब महिलाएं भगवान के बारे में बात कर रही थी, तो उनकी बातें वैदिक मंत्रों से भी ज्यादा मनोरम थीं। भगवान की प्रशंसा में गाया गया कुछ भी श्रुति मंत्र है। गौड़ीय संप्रदाय के आचार्यों में से एक ठाकुर नरोत्तम दास के गीत हैं, जो साधारण बंगाली भाषा में लिखे गए हैं। लेकिन इसी संप्रदाय के एक अन्य बहुत विद्वान आचार्य ठाकुर विश्वनाथ चक्रवर्ती ने ठाकुर नरोत्तम दास के गीतों को वैदिक मंत्रों के समान अच्छा बताया है। और इसका कारण उनका विषय है। भाषा अप्रासंगिक है, लेकिन विषय महत्वपूर्ण है। जो महिलाएं सभी भगवान के विचार और कार्यों में लीन थीं, उनमें भगवान की कृपा से वैदिक ज्ञान की चेतना विकसित हुई। और इसलिए, हालांकि ऐसी महिलाएं संस्कृत या अन्यथा बहुत विद्वान विद्वान नहीं हो सकती हैं, फिर भी वह जो कुछ भी बोलती थीं वह वैदिक भजनों से अधिक आकर्षक थी। उपनिषदों में वैदिक भजन कभी-कभी परोक्ष रूप से परमेश्वर को निर्देशित होते हैं। लेकिन महिलाओं की बातें सीधे भगवान की ही थीं, और इस तरह वे दिल को ज्यादा भाने वाली थीं। महिलाओं की बातें विद्वान ब्राह्मणों के आशीर्वाद से ज्यादा मूल्यवान प्रतीत होती थीं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥