श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 7: जगद-आनन्द (विश्वों का आनंद)  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  2.7.41 
बाष्प-संरुद्ध-कण्ठः सन्न्
अस्रोपहत-लोचनः
परं तच्-चरणाम्भोजे
मूर्ध्नि धृत्वारुदत्-तराम्
 
 
अनुवाद
उसका गला सिसकियों से भर गया, उसकी आँखें आँसुओं से जल उठीं, वह केवल इतना ही कर सका कि अपना सिर कृष्ण के चरण कमलों पर रख दिया और खूब रोया।
 
His throat choked with sobs, his eyes burned with tears, all he could do was place his head at Krishna's lotus feet and weep profusely.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)