यत्-पाद-पांशुर् बहु-जन्म-कृच्छ्रतो
धृतात्मभिर् योगिभिर् अप्य् अलभ्यः
स एव यद्-दृग्-विषयः स्वयं स्थितः
किं वर्ण्यते दिष्टम् अतो व्रजौकसाम्
अनुवाद
"योगी अनेक जन्मों तक कठोर तपस्या और तप करते हैं। फिर भी, समय आने पर, जब ये योगी मन को वश में करने की सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, तब भी वे भगवान के चरणकमलों की धूल के एक कण का भी स्वाद नहीं ले पाते। तब हम व्रजभूमि के उन निवासियों के महान सौभाग्य का क्या वर्णन कर सकते हैं, जिनके साथ भगवान स्वयं रहते थे और जिन्होंने भगवान को साक्षात् देखा था?"
"Yogis perform severe austerities and penances for many lifetimes. Yet, in due course, when these yogis attain the perfection of controlling the mind, they still cannot taste even a particle of the dust from the Lord's feet. How, then, can we describe the great good fortune of those residents of Vrajabhumi, with whom the Lord Himself lived and who saw the Lord in person?"
तात्पर्य
ग्वाल-बालकों के भाग्य की महिमा है कि वे कृष्ण के दर्शन कर सकते है, यह कहना कठिन है कि कृष्ण के साथ निरंतर खेलने वाले कितने भाग्यशाली होंगे। ग्वाल-बालक और वृज-भूमि के सभी निवासी सृष्टि के सबसे भाग्यशाली प्राणी है क्योंकि वे कृष्ण के सौंदर्य के साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। साधु-संत जीवन काल भर कृष्ण की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते हैं, परन्तु अपने सारे परिश्रम के बावजूद वे कभी भी वृज-वासियों के जितने भाग्यशाली नहीं हो सकते। कृष्ण के चरणों की धूल के एक कण को प्राप्त करना भी उन योगियों के लिए असंभव है, जो विनम्रता से वृज के भक्तों के पद-चिह्नों पर नहीं चलते। कृष्ण के चरणों की धूल का अर्थ कई प्रकार से समझा जा सकता है। इसका अर्थ उनके चरणों का एक परमाणु हो सकता है। इसका अर्थ वृज-भूमि की धूल में उनके पैरों के चिह्न हो सकते हैं। इसका अर्थ वह धूल हो सकती है जो उनके चरणों के संपर्क में आने के बाद उनके विचरने के दौरान कहीं गिर गई हो। इसका अर्थ किसी भी ऐसी वस्तु से हो सकता है जो अप्रत्यक्ष रूप से भी उनके चरणों के संपर्क में रही हो, चाहे वह कितनी भी दूर से हो। या फिर कृष्ण के चरणों की धूल शब्दों पाँद-पाँशु को पाँदप-अंशु में पुनः विभाजित और रूपांतरित किया जा सकता है, जिसका अर्थ कृष्ण के प्रिय कदम्ब वृक्षों और वृन्दावन वन के अन्य वृक्षों (पाँदप) से निकलने वाली कांति (अंशु) हो। इनमें से किसी भी अर्थ में कृष्ण के पाँद-पाँशु के साथ सबसे दूर का संपर्क भी रहस्यमय योगियों के लिए एक दुर्लभ उपलब्धि है। सफलता प्राप्ति के लिए दृढ़ निश्चयी योगी, ब्रह्मचर्य और अन्य तपस्याओं जैसे कठोर अनुशासनों का पालन करते हैं। भौतिक वस्तुओं से मन और इंद्रियों को हटाकर वे आत्म-संयम प्राप्त करने के लिए कई जन्मों तक प्रयास करते हैं। परन्तु यदि वे समाधि की सफलता प्राप्त भी कर लेते हैं, तो भी वे कृष्ण को प्राप्त नहीं कर सकते, जो आध्यात्मिक पूर्णता के पूर्ण प्रतीक हैं, सच्चिदानंद-घन-मूर्ति। वे इंद्रियों की सीमा से परे हैं। केवल वृजवासी ही उन्हें यथावत देख सकते हैं। वृज में प्रकट होने वाला परमेश्वर का स्वरूप विभूति नहीं है, जो ईश्वर के अत्यधिक विस्तारों में से एक है, न ही वे भगवान का आंशिक अवतार हैं, और न ही वे स्वयं भगवान नारायण हैं। वे ईश्वर के सभी रूपों के मूल स्रोत हैं, फिर भी ग्वाल-बालकों द्वारा किसी भी अन्य बोधगम्य वस्तु की तरह देखे जाने योग्य हैं और उनकी दृष्टि में निरंतर स्थिर (स्थित) रहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो, वे उनकी आँखों के रास्ते से कभी नहीं हटते। फिर वृजवासियों के भाग्य की महिमा का वर्णन कैसे किया जा सकता है? या फिर शुकदेव के प्रश्न का दूसरे ढंग से अनुवाद करें तो, किम वर्ण्यते द्रष्टम यह पूछता है कि क्या वृजवासियों की स्थिति उनके भाग्य का परिणाम है। इसका उत्तर, निःसंदेह यह है कि वृजवासियों की स्थिति पिछले जन्मों में किए गए पुण्य कार्यों का कर्म प्रभाव नहीं है। यह तो केवल कृष्ण की दया का परिणाम है। या फिर शब्दों को दूसरे ढंग से विभाजित करें, तो वृजवासियों की भाग्यशाली स्थिति एक सतत उत्सव (द्रष्ट-महो) है। या फिर उनके भाग्य की शक्ति अकल्पनीय है (अद्रष्ट- या अदृष्ट-महो)। वृजवासियों का शुद्ध भक्तिभाव इन सभी विशेषताओं को प्रदर्शित करता है। एक विवेकपूर्ण पाठक इस छंद के स्थान पर प्रश्न उठा सकता है-जो सिर्फ कृष्ण को देखने के सौभाग्य के बारे में बतलाता है-ग्वाल-बालकों के साथ हमेशा खेलने के विशिष्ट भाग्य को प्रदर्शित करने वाले छंद के बाद। पाठक तर्क दे सकता है कि कृष्ण के साथ खेलने के सौभाग्य में स्वतः ही उन्हें देखने का सौभाग्य भी शामिल है और उससे कहीं बढ़कर है, इसलिए इन चीजों को कम से अधिक, सामान्य से विशिष्ट की प्राकृतिक तार्किक व्यवस्था से बाहर रखना काव्य शैली में एक दोष है। इस उचित संदेह को समायोजित करने के लिए, हम शुकदेव के कथनों का एक और ढंग से निर्माण कर सकते हैं: कृष्ण के साथ खेलने का आनंद लेने वाले बालक वास्तव में बहुत भाग्यशाली हैं, और यह छंद इस दावे को यह दिखाकर विस्तार देता है कि वास्तव में वृज में रहने वाले सभी प्राणी वर्णन से परे भाग्यशाली हैं। यह साबित करना आसान है कि वृज का कोई भी निवासी सबसे कुशल योगी से बड़ा है। इसलिए स्वाभाविक रूप से स्पष्ट है कि जो बालक परमेश्वर के व्यक्तित्व के इतने करीब रहते हैं और जो उनके लिए इतने विशेष रूप से प्रिय हैं, वह सभी जीवों में सबसे श्रेष्ठ हैं। या हम कह सकते हैं कि शुकदेव विशेष रूप से ग्वाल-बालकों की-वृज-भूमि के इन निवासियों-की महिमा करना जारी रख रहे हैं, क्योंकि कृष्ण उनकी दृष्टि का सतत उद्देश्य हैं। गोप-कुमारों की आँखें कृष्ण और सिर्फ कृष्ण को ही देखती हैं। एक सामान्य नियम के रूप में, प्रत्येक व्यक्तिगत इंद्रिय की अपनी उचित वस्तु होती है। दृष्टि की इंद्रिय केवल दृश्य रूपों को देखती है, न कि स्वाद, गंध या अन्य संवेदनाओं को। परन्तु कृष्ण में बालकों का ध्यान इतना तल्लीन होता है कि वे इस बात की उपेक्षा करते हैं कि उनके सामने और क्या मौजूद है। अन्य लोगों की आँखें घड़ों और कपड़ों जैसी विभिन्न वस्तुओं को देखती हैं, परन्तु ग्वाल-बालक अपनी आँखें जहाँ भी घुमाते हैं, वे केवल कृष्ण को ही देखते हैं-अर्थात वे सब कुछ कृष्ण के संदर्भ में देखते हैं। श्री जयदेव कवि की कविता इस तरह के विशेष दर्शन को दर्शाती है: पश्यति दिशि दिशि रहसि भवन्तम, "प्रत्येक दिशा में, प्रत्येक गुप्त कोने में, वह सिर्फ तुम्हें ही देखती है।" (गीत-गोविंद 12.1) इस प्रकार शुकदेव के लिए पिछले छंद के बाद इस छंद को बोलना उचित है, क्योंकि कृष्ण के साथ हमेशा खेलने के ग्वाल-बालकों के सौभाग्य से भी बड़ा सौभाग्य उनका हर जगह उन्हें हमेशा देख पाना है। यह उनके कृष्ण के प्रति प्रेम को गोपियों के प्रेम के लगभग जितना ही अच्छा होने का प्रमाण है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥