श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.6.86 
तच् छ्रुत्वाहुः प्रियं गोप्यः
श्री-यशोदे व्रजेश्वरि
देवि रोहिणि कर्तव्याद्
अस्माद् विरमतां युवाम्
 
 
अनुवाद
यह वचन सुनकर गोपियाँ स्नेहपूर्वक बोलीं: हे व्रज की रानी श्री यशोदा और प्रिय रोहिणीदेवी, कृपया स्नान का यह कार्य छोड़ दीजिए।
 
Hearing these words, the gopis said affectionately: O Queen of Vraja, Sri Yashoda, and dear Rohini Devi, please give up this task of bathing.
तात्पर्य
कृष्ण का आग्रह सुनकर गोपियां खुश हो गईं क्योंकि यह उन्हें यशोदा मैया, रोहिणी और बलराम को विदा करने का बहाना दे रहा था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)