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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)
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श्लोक 44
श्लोक
2.6.44
श्री-गोप-कुमार उवाच
परमामृत-धाराभिर्
अभिषिक्त इवाभवम्
तया तं दर्शितं मार्गम्
एक-दृष्ट्या व्यलोकयन्
अनुवाद
श्रीगोपकुमार ने कहा: मानो मैं शुद्धतम अमृत की वर्षा से अभिषिक्त हो गया हूँ, मैं एकाग्रचित्त होकर उस मार्ग की ओर देखने लगा, जो वृद्धा ने बताया था।
Sri Gopakumar said: As if I had been anointed with the shower of the purest nectar, I concentrated and looked towards the path shown by the old woman.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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