श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  2.6.38 
गोपिकानां च यद् गीतं
श्रूयते रोदनान्वितम्
तत्-तोषस्य शुचो वान्त्य-
काष्ठयेति न बुध्यते
 
 
अनुवाद
मैंने गोपियों के गीत सुने, उनके रोने के साथ, पर क्या वे परम संतोष के गीत थे या परम दुःख के? मैं नहीं बता सका।
 
I heard the songs of the gopis, accompanied by their weeping, but were they songs of supreme contentment or of supreme sorrow? I couldn't tell.
तात्पर्य
कृष्ण के प्रति उनके अद्भुत प्रेम के शीर्ष पर उत्पन्न, गोलोक-वासियों का व्यवहार गोप-कुमार को हैरान करता है। ऐसा ऊँचा प्रेम कुछ बहुत भाग्यशाली व्यक्तियों को छोड़कर बाकियों की समझ से परे है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)