कदाचिद् दर्शनं वा स्याद्
वैकुण्ठादि-निवासिनाम्
श्री-कृष्ण-विरहेणार्तान्
इव पश्यामि तान् अपि
अनुवाद
समय-समय पर मैं वैकुंठ या किसी अन्य स्थान के निवासियों को देखता हूँ, किन्तु मेरी दृष्टि में वे श्रीकृष्ण के वियोग से पीड़ित प्रतीत होते हैं।
From time to time I see the inhabitants of Vaikuntha or some other place, but to me they appear to be suffering from separation from Sri Krishna.
तात्पर्य
श्री सरूप का दृष्टिकोण व्रज-भाव, व्रज के भाव में स्थित एक परमहंस का है | वे प्रत्येक व्यक्ति को, यहाँ तक कि बाहरी लोगों को भी इस भाव में देखते हैं | जब वे द्वारिका, अयोध्या, और बैकुंठ से आये भक्तों से मिलते हैं, तो वे उन पर अपनी भावनाओं को प्रक्षेपित करते हैं और यह मान लेते हैं कि वे व्रज में कृष्ण के साथ न होने पर भी दुखी हैं | इस प्रकार, सरूप को कुछ भी गोलोक के गौरव पर अपने ध्यान से विचलित नही कर सकता है, और वे सभी परिस्थितियों में संतुष्ट रहते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥