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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)
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श्लोक 37
श्लोक
2.6.37
निश्चेतुं नाशकं किं ते
परमानन्द-निर्वृताः
किं वा दुःख-भर-ग्रस्ता
जनाः सर्वे द्विजोत्तम
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, मैं यह नहीं समझ सका कि वहाँ के सभी लोग परम आनंद का आनंद ले रहे थे या भयंकर दुखों से ग्रस्त थे।
O best of Brahmins, I could not understand whether all the people there were enjoying supreme bliss or were suffering from terrible sufferings.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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