कृष्ण की लीलाओं में कभी कोई दोष नहीं होता है, तब भी जब कृष्ण एक साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं:
एवं धार्त्स्यन्युशति कुरुते मेहनादीनि वस्तौ
स्तेयोपायैर विरचिता कृति: सु प्रतीको यथास्ते
इत्थं स्त्रीभि: सा-भय नयना-श्रीमुखालोकिनीभि:
व्याख्यातार्था प्रहसिता मुखी न हि उपालब्धुम ऐच्छत्
"पड़ोस की महिलाओं ने यशोदा से शिकायत की:'जब कृष्ण अपनी शरारती गतिविधियों में पकड़े जाते हैं, तो घर का मालिक उनसे कहेगा, "ओह, तुम चोर हो!" और कृष्ण पर कृत्रिम रूप से गुस्सा व्यक्त करेगा। कृष्ण तब जवाब देंगे, "मैं चोर नहीं हूं। तुम चोर हो!" कभी-कभी, क्रोधित होने पर, कृष्ण हमारे घरों में एक साफ जगह पर पेशाब और मल त्यागते हैं। लेकिन अब, हमारी प्रिय मित्र यशोदा, यह विशेषज्ञ चोर आपके सामने एक बहुत अच्छे लड़के की तरह बैठा है।' कभी-कभी सभी गोपियाँ वहाँ बैठे कृष्ण को देखती थीं, उनकी आँखें भयभीत थीं ताकि उनकी माँ उन्हें दंडित न करें, और जब उन्होंने कृष्ण का सुंदर चेहरा देखा, तो उनके बारे में शिकायत करना जारी रखने के बजाय वे बस उनके चेहरे को देखतीं और आध्यात्मिक आनंद का आनंद उठाती थीं। माँ यशोदा इस सारी मस्ती पर हल्के से मुस्कुराती थीं, और वह अपने धन्य आध्यात्मिक बच्चे को दंडित नहीं करना चाहती थीं।" (भागवतम 10.8.31)
कृष्ण के चरणों में उनकी लीलाएँ उनकी सेवा करने की अपनी इच्छा से आकर्षित होती हैं, और वे अपने भक्तों के सेवा भाव से आकर्षित होती हैं। श्री विष्णु पुराण (5.22.18) के शब्दों में:
मनुष्य-देहिनां चेष्टां
इति एवं अनुवर्तत:
लीला जगत्-पते तस्या
चंदता: सम्प्रवर्तते
"ब्रह्मांड के स्वामी की लीलाएँ अपनी मधुर इच्छा से सामने आती हैं, क्योंकि वह मनुष्यों के रूप में सन्निहित प्राणियों की गतिविधियों का अनुकरण करते हैं।"
