श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 362
 
 
श्लोक  2.6.362 
लीलैव नित्या प्रभु-पाद-पद्मयोः
सा सच्-चिद्-आनन्द-मयी किल स्वयम्
आकृष्यमाणेव तदीय-सेवया
तत्-तत्-परीवार-युता प्रवर्तते
 
 
अनुवाद
भगवान की लीलाएँ नित्य, पूर्णतः आध्यात्मिक हैं, जो शाश्वतता, ज्ञान और आनंद से निर्मित हैं। वे लीलाएँ, स्वतः ही भगवान के चरणकमलों की ओर आकर्षित होकर, सेवा में संलग्न होकर, सर्वत्र उनका अनुसरण करती हैं और प्रत्येक अवसर पर उनके लिए दल और साज-सज्जा उपलब्ध कराती हैं।
 
The Lord's pastimes are eternal, completely spiritual, composed of eternity, knowledge, and bliss. These pastimes, automatically attracted to the Lord's lotus feet, engage in service, follow Him everywhere, and provide His entourage and decorations on every occasion.
तात्पर्य
कृष्ण की लीलाएँ सच्चिदानंदमयी हैं, जो सत् (शाश्वत अस्तित्व), चित (पूर्ण जागरूकता) और आनंद (शुद्ध उल्लास) से बनी होती हैं। इस संदर्भ में प्रत्यय -मायी का अर्थ या तो "पहचान" या "रूपांतरण" हो सकता है। दूसरे शब्दों में, चूंकि कृष्ण की लीलाएँ कृष्ण की आंतरिक ऊर्जा का प्रदर्शन हैं, इसलिए वे उनसे भिन्न नहीं हैं, और वे आध्यात्मिक विविधता की अभिव्यक्ति भी हैं।

कृष्ण की लीलाओं में कभी कोई दोष नहीं होता है, तब भी जब कृष्ण एक साधारण व्यक्ति की तरह व्यवहार करते हुए दिखाई देते हैं:

एवं धार्त्‍स्‍यन्‍युशति कुरुते मेहनादीनि वस्‍तौ

स्‍तेयोपायैर विरचिता कृति: सु प्रतीको यथास्‍ते

इत्‍थं स्‍त्रीभि: सा‍-भय नयना-श्रीमुखालोकिनीभि:

व्‍याख्‍यातार्था प्रहसिता मुखी न हि उपालब्‍धुम ऐच्‍छत्‌‍

"पड़ोस की महिलाओं ने यशोदा से शिकायत की:'जब कृष्ण अपनी शरारती गतिविधियों में पकड़े जाते हैं, तो घर का मालिक उनसे कहेगा, "ओह, तुम चोर हो!" और कृष्ण पर कृत्रिम रूप से गुस्सा व्यक्त करेगा। कृष्ण तब जवाब देंगे, "मैं चोर नहीं हूं। तुम चोर हो!" कभी-कभी, क्रोधित होने पर, कृष्ण हमारे घरों में एक साफ जगह पर पेशाब और मल त्यागते हैं। लेकिन अब, हमारी प्रिय मित्र यशोदा, यह विशेषज्ञ चोर आपके सामने एक बहुत अच्छे लड़के की तरह बैठा है।' कभी-कभी सभी गोपियाँ वहाँ बैठे कृष्ण को देखती थीं, उनकी आँखें भयभीत थीं ताकि उनकी माँ उन्हें दंडित न करें, और जब उन्होंने कृष्ण का सुंदर चेहरा देखा, तो उनके बारे में शिकायत करना जारी रखने के बजाय वे बस उनके चेहरे को देखतीं और आध्यात्मिक आनंद का आनंद उठाती थीं। माँ यशोदा इस सारी मस्ती पर हल्के से मुस्कुराती थीं, और वह अपने धन्य आध्यात्मिक बच्चे को दंडित नहीं करना चाहती थीं।" (भागवतम 10.8.31)

कृष्ण के चरणों में उनकी लीलाएँ उनकी सेवा करने की अपनी इच्छा से आकर्षित होती हैं, और वे अपने भक्तों के सेवा भाव से आकर्षित होती हैं। श्री विष्णु पुराण (5.22.18) के शब्दों में:

मनुष्‍य-देहिनां चेष्‍टां

इति एवं अनुवर्तत:

लीला जगत्-पते तस्‍या

चंदता: सम्‍प्रवर्तते

"ब्रह्मांड के स्वामी की लीलाएँ अपनी मधुर इच्छा से सामने आती हैं, क्योंकि वह मनुष्यों के रूप में सन्निहित प्राणियों की गतिविधियों का अनुकरण करते हैं।"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)