श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  2.6.36 
अदृष्टम् अश्रुतं चान्यैर्
असम्भाव्यं व्यलोकयम्
बहु-प्रकारम् आश्चर्यं
लक्षशस् तत्र कोटिशः
 
 
अनुवाद
और वहां मैंने लाखों-करोड़ों की संख्या में, सभी प्रकार के आश्चर्य देखे, अनदेखे, अनसुने, इस दुनिया में किसी के लिए भी अकल्पनीय।
 
And there I saw millions and millions of wonders of all kinds, unseen, unheard of, unimaginable to anyone in this world.
तात्पर्य
गोपा-कुमार किसी मथुरा के ब्राम्हण को अपने द्वारा देखी हुई अद्भुत चीजों के बारे में बहुत कुछ नहीं बता सकते थे, जिसने कुछ भी तुलनीय नहीं देखा था। लेकिन इस शिष्य के प्रति मैत्रीपूर्ण होने के कारण, गोपा-कुमार उसे कुछ समझने में मदद करने की कोशिश करेंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)