श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 353
 
 
श्लोक  2.6.353 
नीयमाने पुनस् तेन
तथैव व्रज-जीवने
तत्रत्यानां दशा कापि
पूर्व-वत् समजायत
 
 
अनुवाद
उसने एक बार फिर व्रज के प्राण ले लिये और उसके निवासी पुनः उसी स्थिति में चले गये।
 
He once again took the life of Vraj and its inhabitants went back to the same condition.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)