श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 345
 
 
श्लोक  2.6.345 
श्री-परीक्षिद् उवाच
एवं मनस्य् आगत-तत्-प्रवृत्ति-
प्रादुष्कृतात्यन्त-शुग्-अग्नि-दग्धः
मुग्धो ’भवद् गोप-कुमार-वर्यो
मातः सरूपो नितरां पुनः सः
 
 
अनुवाद
श्री परीक्षित बोले: हे माता! ग्वालों में श्रेष्ठ सरूप पुनः अत्यन्त व्याकुल हो गए। व्रज में जो कुछ हुआ था, उस पर विचार करते हुए उनका हृदय शोक की अग्नि में जलने लगा।
 
Shri Parikshit said: O Mother! Sarupa, the best of cowherds, was again deeply distressed. Thinking about what had happened in Vraja, his heart burned with grief.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)