श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 337
 
 
श्लोक  2.6.337 
किन्तूपनयनस्यायं
कालस् तद् ब्रह्म-चारिणौ
भूत्वा स्थानान्तरे गत्वा-
धीत्येमौ व्रजम् एष्यतः
 
 
अनुवाद
लेकिन अब उनके दीक्षा लेने का समय आ गया है। उन्हें ब्रह्मचारी बनकर किसी अन्य स्थान पर जाकर अध्ययन करना चाहिए। उसके बाद वे व्रज लौट सकते हैं।
 
But now the time has come for him to take initiation. He should become a celibate and study elsewhere. After that, he can return to Vraja.
तात्पर्य
जैसे धर्म-शास्त्रों में बताया गया है कि वैश्यों के पुत्रों को ग्यारह वर्ष की आयु में उपनयन-संस्कार (दीक्षा द्वारा पवित्र धागे की स्वीकृति) से गुजरना चाहिए। बलराम और कृष्ण, वसुदेव का सुझाव है कि अपवाद नहीं हैं। उन्हें भी वेदों का अध्ययन करने के लिए एक विद्वान ब्राह्मण के गुरुकुल में भेजा जाना चाहिए। उन्हें मथुरा में या वृंदावन में अपने माता-पिता के साथ घर पर रहना नहीं चाहिए। लेकिन जब तक उपनयन समारोह की व्यवस्था नहीं होती, बलराम और कृष्ण वसुदेव के साथ सुरक्षित रह सकते हैं जबकि वे मथुरा में अपना व्यवसाय पूरा करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)