श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 335
 
 
श्लोक  2.6.335 
श्री-सरूप उवाच
एवं विक्लवितं तेषां
श्रुत्वा तूष्णीं स्थिते प्रभौ
व्रजं जिगमिषां तस्या-
शङ्क्य शूर-सुतो ’ब्रवीत्
 
 
अनुवाद
श्री सरूप ने कहा: "अपने भक्तों की ये शिकायतें सुनकर भगवान मौन खड़े रहे। तभी शूरसेन के पुत्र वसुदेव बोले, क्योंकि उन्हें भय था कि कहीं भगवान व्रज जाने का निश्चय न कर लें।"
 
Sri Sarup said: "Hearing these complaints from His devotees, the Lord stood silently. Then Vasudeva, the son of Shurasena, spoke, for he feared that the Lord might decide to go to Vraja."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)