श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 302
 
 
श्लोक  2.6.302 
यशोदा रुदतीर् दृष्ट्वा
पतिता धूलि-पङ्किलाः
मुह्यतीर् विह्वला गोपीः
प्रारुदत् करुण-स्वरम्
 
 
अनुवाद
गोपियों को रोते, मूर्छित होते, भूमि पर गिरते तथा धूल से लिपटे हुए देखकर यशोदा भी करुण स्वर में रोने लगीं।
 
Seeing the Gopis crying, fainting, falling on the ground and covered in dust, Yashoda also started crying in a sad voice.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)