श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 247
 
 
श्लोक  2.6.247 
नागम् अश्वम् इवारूढश्
चोदयाम् आस तं हठात्
धृतां दक्षिण-हस्तेन
मुरलीं वादयन् मुदा
 
 
अनुवाद
घोड़े की तरह सर्प पर सवार होकर, कृष्ण उसे बलपूर्वक आगे की ओर धकेलते रहे, और इस दौरान वे अपने दाहिने हाथ से प्रसन्नतापूर्वक बांसुरी बजाते रहे।
 
Riding the serpent like a horse, Krishna forcefully pushed it forward, all the while happily playing the flute with his right hand.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)