श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 242
 
 
श्लोक  2.6.242 
तेष्व् एव नीत्वा युगपन् निज-प्रियास्
ता गोपिकाः सत्वरम् अध्यरोहयत्
रत्न-स्थली-पङ्क्ति-समेषु सर्वतश्
चित्रातिचित्र-भ्रमणाभिरामिषु
 
 
अनुवाद
कृष्ण ने अपनी सभी प्रिय गोपियों को एक साथ पकड़कर फुर्ती से उन्हें सर्प के फन पर चढ़ा दिया। वे फन, आगे-पीछे झूमते हुए, रत्नजटित चबूतरों की पंक्तियों के समान प्रतीत हो रहे थे, जिससे एक अत्यंत प्रभावशाली दृश्य उत्पन्न हो रहा था।
 
Krishna gathered all his beloved gopis together and swiftly placed them on the serpent's hood. The hood, swaying back and forth, resembled rows of jeweled platforms, creating a most impressive sight.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)