श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.6.24 
तेषां दर्शन-मात्रेण
तादृशं भावम् आप्नुवन्
यत्नाद् धैर्यम् इवासृत्या-
पृच्छं तान् इदम् आदरात्
 
 
अनुवाद
उन्हें देखते ही मुझे भी वैसा ही स्नेह महसूस हुआ। मैंने खुद को संभाला और आदरपूर्वक उनसे ये प्रश्न पूछे।
 
I felt a similar sense of warmth as I looked at him. I composed myself and respectfully asked him these questions.
तात्पर्य
इन भक्तों के मात्र दर्शन मात्र से गोप-कुमार में वही तीव्र भावनाएँ उत्पन्न हुईं, जो उनमें थीं। वह लगभग संयत स्थिति में (धैर्यम इव आश्रित्य) स्वयं को लाने में सफल तो हुए परन्तु पूर्ण रूप से संयत नहीं, अन्यथा वह ऐसे प्रश्न न पूछते जिनका उत्तर वे स्वयं भी दे सकते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)