श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 226
 
 
श्लोक  2.6.226 
आक्रन्द-दीना विहगा ह्रदस्य
तस्यान्तर् उड्डीय पतन्ति वेगात्
वृक्षादयस् तत्-क्षणम् एव शोषं
प्राप्ता महोत्पात-चयाश् च जाताः
 
 
अनुवाद
ज़ोर-ज़ोर से रोने से थके हुए पक्षी तेज़ी से झील में उड़ गए। पेड़-पौधे अचानक सूख गए। और कई भयानक अपशकुन दिखाई देने लगे।
 
The birds, exhausted by their loud cries, flew swiftly into the lake. The trees and plants suddenly withered. And many terrible omens began to appear.
तात्पर्य
सभी प्राणी, पक्षियों और पेड़ों तक को, कृष्ण की दुविधा पर पीड़ा हो रही थी। वे सब मृत्यु के कगार पर थे। पृथ्वी काँप रही थी, अन्य भयावह संकेतों के बीच:

अथा व्रजे महतोपाताः

त्रि-विधा ह्यति-दारुणाः

उत्पतुर भुवि दिव्यात्मनि

आसन्न-भय-शंसिनाः

"वृंदावन क्षेत्र में भयंकर प्रलय के तीनों प्रकार के संकेत उभरे - वे जो पृथ्वी पर थे, वे जो आकाश में थे, और वे जो जीवित प्राणियों के शरीर में थे - जो आसन्न खतरे की घोषणा करते थे।" (भागवतम १०.१६.१२)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)