श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 217
 
 
श्लोक  2.6.217 
सर्वास् तद्-उचितां तास् तु
क्रीडा-सुख-परम्पराम्
सर्वदानुभवन्त्यो ’पि
मन्यन्ते प्रेम न प्रभोः
 
 
अनुवाद
सभी गोपियाँ उस परम और परम प्रेम का आनंद लेती हैं और कृष्ण की अनंत लीलाओं के आनंद को निरंतर जानती हैं। फिर भी कोई भी गोपी यह कल्पना भी नहीं करती कि कृष्ण का उस पर विशेष प्रेम है।
 
All the gopis enjoy that supreme and ultimate love and constantly know the bliss of Krishna's endless pastimes. Yet no gopi even imagines that Krishna has special love for her.
तात्पर्य
यद्यपि अनेक गोपियाँ कृष्ण की कृपा पाने के लिए उत्सुक थीं, फिर भी उनमें से किसी को भी अपनी सेवा से उसे संतुष्ट करने के अवसरों में कभी कमी नहीं रही। यह इस बात का प्रमाण है कि सभी गोपियों ने शुद्ध भक्ति सेवा की उच्चतम सिद्धि प्राप्त कर ली है। फिर भी उनमें से कोई भी अपने आपको कृष्ण की एकमात्र प्रेमिका नहीं मानती। अपनी खुशी की परवाह किए बिना, वे केवल वही करना चाहती हैं जिससे उन्हें प्रसन्नता हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)