श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 215
 
 
श्लोक  2.6.215 
यया युक्ति-शतैर् व्यक्तं
मादृशैर् अनुमन्यते
आभिः समो न को ’प्य् अन्य-
त्रत्यो ’प्य् अस्य प्रियो जनः
 
 
अनुवाद
यह सैकड़ों तर्कों का प्रमाण है, जिनके द्वारा मेरे जैसे व्यक्ति यह समझ सकते हैं कि उस धाम में या अन्यत्र, गोपियों के समान उन्हें कोई भी प्रिय नहीं है।
 
This is the proof of hundreds of arguments by which a person like me can understand that in that abode or elsewhere, there is no one dearer to Him than the Gopis.
तात्पर्य
गोपियों के प्रति कृष्ण का प्रेम, करूणा और लगाव सरूप को यह विश्वास दिलाने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि गोलोक का कोई भी निवासी गोपियों जितना प्रिय नहीं है। इन तीनों संकेतों ने सरूप को इस निष्कर्ष के पक्ष में सैकड़ों तर्कों की खोज करने के लिए प्रेरित किया है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)