श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 209
 
 
श्लोक  2.6.209 
कृत्स्नम् एतत् परं चेत्थं
तत्रत्यं विद्ध्य् असंशयम्
पूर्वोक्त-नारदोद्दिष्ट-
सिद्धान्ताद्य्-अनुसारतः
 
 
अनुवाद
कृपया गोलोक के बारे में यह सब और बाकी सब कुछ इसी तरह, बिना किसी संदेह या भ्रम के, समझने का प्रयास करें। जैसा कि पहले कहा गया है, नारद द्वारा बताए गए दार्शनिक निष्कर्षों के अनुसार इसे समझें।
 
Please try to understand all this and everything else about Goloka in the same way, without any doubt or confusion. As stated earlier, understand it according to the philosophical conclusions laid out by Narada.
तात्पर्य
श्री सरूप के शिष्य को अभी भी गोलोक के बारे में संदेह हो सकता है। उदाहरण के लिए, वह प्रश्न कर सकता है, कि कैसे दानव वैकुण्ठ से भी बड़े स्थान में मौजूद हो सकते हैं या गोलोक-वासी, वहां कभी भी पहले दानवों को देखने के आभास को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा, यदि गोलोक विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है, सच्चिदानंद है, तो वहां जड़ चीजें जैसे लकड़ी, पत्थर, गाड़ियाँ और गाय के खुरों से धूल कैसे हो सकती है? और गोलोक को आमतौर पर वैकुण्ठ से बड़ा और ऊँचा नहीं माना जाता है। तो कृष्ण के प्रिय सहभागी गोलोक से उतरकर वैकुण्ठ पारषद कैसे बन सकते हैं?

सरूप ने पहले ही गोलोक की महिमा के अपने वर्णन में इन संदेहों का उत्तर दिया है। उन्होंने संक्षेप में उन शिक्षाओं को दोहराया जो नारद ने उन्हें पहले, वैकुण्ठ में गोलोक के अद्वितीय कद के बारे में दी थीं और अपनी टिप्पणियों के साथ उन शिक्षाओं को स्पष्ट किया। यदि मथुरा ब्राह्मण को और भी अधिक शास्त्रीय समर्थन चाहिए है, तो वह पद्म पुराण (उत्तर-खंड) और पंचरात्र के विभिन्न कथनों को देख सकता है।

श्री बृहद-भागवतामृत के आगामी छंदों में, श्री सरूप गोलोक में अपने निजी सहयोगियों और उपकरणों के साथ साकार होने वाले ईश्वर के व्यक्तित्व के अतींद्रिय लीलाओं के बारे में अधिक बताएंगे। तब ब्राह्मण को सूचित किया जाएगा कि कैसे कंस और अन्य दानव कृष्ण के निवास में रहते हैं। संक्षेप में, कंस और कृष्ण के अन्य शत्रु भी कृष्ण के अनादि लीलाओं में शामिल होते हैं, उसी कारण के लिए जिस कारण से कृष्ण के वैकुण्ठ सहयोगी अपनी आध्यात्मिक पहचान में उनके साथ जुड़ते हैं, अर्थात कृष्ण के आनंद को बढ़ाना। कृष्ण के निवास में गाड़ियाँ और अन्य स्पष्ट रूप से निर्जीव वस्तुएँ वास्तव में जीवित हैं और पूरी तरह से आध्यात्मिक सच्चिदानंद हैं। श्री बृहद-भागवतामृत के विवरणों के अनुसार, कृष्ण के निवास गोलोक में सब कुछ वैकुण्ठ की तरह ही अतींद्रिय है। इस निष्कर्ष का समर्थन करने के लिए शास्त्रीय प्रमाण बाद में उद्धृत किए जाएंगे।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)