श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 204
 
 
श्लोक  2.6.204 
यथावताराः कृष्णस्या-
भिन्नास् तेनावतारिणा
तथैषाम् अवतारास् ते
न स्युर् एतैः समं पृथक्
 
 
अनुवाद
और जिस प्रकार समस्त अवतारों के स्रोत श्री कृष्ण के अवतार उनसे अभिन्न हैं, उसी प्रकार गोलोकवासियों के अवतार भी उनसे अभिन्न हैं।
 
And just as the incarnations of Shri Krishna, the source of all incarnations, are inseparable from Him, similarly the incarnations of the people of Goloka are also inseparable from Him.
तात्पर्य
गोलोक के भक्त अवतरित होने पर अपने नाम और रूप बदल सकते हैं, परन्तु फिर भी वे वहीं व्यक्ति होते हैं। जैसे, ईश्वर के विस्तारित रूप मूल कृष्ण से भिन्न नहीं होते हैं, जो सत्ता के एक-मात्र स्रोत हैं, इसलिए जब नंद और यशोदा जैसे भक्त वैकुंठ में विस्तारित रूपों में प्रकट होते हैं, तो वे रूप मूलतः गोलोक के मूल रूपों से भिन्न नहीं होते हैं। हालाँकि, स्वर्ग में कश्यप और अदिति, वसुदेव और उनकी पत्नी देवकी के अपूर्ण भाग होने के कारण, आंशिक रूप से पृथ्वी पर वसुदेव और देवकी से भिन्न हैं और आंशिक रूप से वे ही हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)