गोपियों के कुछ गीत श्रीमद भागवतम के दसवें खंड, पैंतीसवें अध्याय में दर्ज हैं:
वाम-बाहु-कृत-वाम-कपोलो
वल्गिता-भ्रुर् अधरार्पित-वेणुम्
कोमलङ्गुलीभिर् आश्रित-मार्गम्
गोप्य ईरयति यत्र मुकुन्दः
व्योम-यान-वनितः सह सिद्धैर्
विस्मितास् तद उपाधर्य्य स-लज्जाः
काम-मार्गण-समर्पित-चित्ताः
कश्मलम् ययुर् अपस्मृत-नीव्याः
"जब मुकुन्द अपने द्वारा अपने होठों पर रखी हुई बाँसुरी बजाते हैं और उसकी छेदों को अपनी कोमल अंगुलियों से बंद करते हैं, वे अपने बाएँ गाल को अपने बाएँ हाथ पर टिकाते हैं और अपनी भौंहों को झुमाते हैं। उस समय अपने पतियों, सिद्धों के साथ आकाश में उड़ान भर रही अप्सराएँ विस्मित हो जाती हैं। जैसे-जैसे वे स्त्रियाँ इसे सुनती हैं, उन्हें शर्मिंदगी होती है कि उनके मन वासनाओं की पूर्ति के लिए आत्मसमर्पण कर बैठे हैं, और वे परेशान हो जाती हैं कि उन्होंने अपनी पेटी खोल दी है।" (भागवतम 10.35.2-3)
