श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  2.6.19 
ततो ’हम् अपि भीतः सन्
कृत-विश्रान्ति-मज्जनः
निःसृत्य त्वरयागच्छं
श्रीमद्-वृन्दावनं ततः
 
 
अनुवाद
मैं भी कंस से डरता था। इसलिए विश्रांतिघाट पर स्नान समाप्त करते ही मैं शीघ्रता से मथुरा छोड़कर वैभवशाली वृन्दावन चला गया।
 
I, too, feared Kansa. Therefore, after bathing at Vishranti Ghat, I quickly left Mathura and went to the glorious Vrindavana.
तात्पर्य
गोक-कुमार के लिए यह बहुत अच्छा था कि वह पहले से ही गोलोका-वासियों के चरित्र को धारण कर रहे थे, क्योंकि वह उन्हें उनकी अंतिम पूर्णता की ओर ले जाएगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)