श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  2.6.168 
उपस्कृत्यास्य ताम्बूलं
मुखे हस्ते समर्प्य च
पुनर् निवृत्य प्राग्-वत् सा
तं वेगैर् आययौ पुनः
 
 
अनुवाद
उसने उनके लिए पान बनाया, कुछ उनके मुँह में और कुछ उनके हाथ में दिया और फिर घर की ओर मुड़ गई। लेकिन एक बार फिर वह जल्दी से उनके पास वापस आ गई।
 
She made him some paan, put some in his mouth and some in his hand, and then turned back towards home. But once again, she quickly returned to him.
तात्पर्य
ठीक पहले वाली ही तरह, यशोदा फिर घबराहट के साथ घूम गईं, उसे देखने-भालने के लिए गर्दन उठाई, और फिर उसके पास लौट आईं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)