श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.6.150 
अरण्य-कण्टकैर् दुष्टैः
क्षतानीमानि सर्वतः
आक्रियन्तास्य गात्रेषु
परितो धावतो मुहुः
 
 
अनुवाद
जब वह जंगल में दौड़ रहे थे, तो उनके शरीर पर भयंकर काँटों ने घाव कर दिए।
 
While he was running in the forest, his body was wounded by terrible thorns.
तात्पर्य
यशोदा ने गोपिकानों के नखों के खरोंचों की इस तरह व्याख्या की। लेकिन बारीकी से जांचने और अपने हाथ से निशान को हल्के से छूने के बाद, उन्हें आश्चर्य हुआ कि जंगल के कांटों ने उनके होंठ कैसे काटे? खैर, यहाँ-वहाँ भागते हुए और लड़कों के साथ जंगलीपन से खेलते हुए, वह अपने मुँह के बल किसी झाड़ी में गिर गया होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)