श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  2.6.15 
तस्मिञ् श्री-मथुरा-रूपे
गत्वा मधु-पुरीम् अहम्
अत्रत्याम् इव तां दृष्ट्वा
विस्मयं हर्षम् अप्य् अगाम्
 
 
अनुवाद
मथुरा की उस मूल भूमि में, मैंने मथुरा शहर का भ्रमण किया। मुझे यह देखकर आश्चर्य और खुशी हुई कि यह शहर धरती पर मौजूद मथुरा जैसा ही था।
 
In that original land of Mathura, I visited the city of Mathura. I was surprised and delighted to see that the city was exactly like the Mathura on earth.
तात्पर्य
गोपा-कुमार यह देखकर हैरान रह गए कि वैकुण्ठ से भी ऊपर की जगहें नश्वर दुनिया की ही तरह दिख रही थीं। अपनी आध्यात्मिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए ऐसी व्यवस्था को पाकर उन्हें खुशी हुई।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)