श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  2.6.143 
सर्वाभिर् एवं परिषेव्यमाणस्
ताभिः स सौहार्द-भरार्द्रिताभिः
ताम्बूलिकं चर्वितम् अत्य्-अभीष्टं
ताभ्यो ददे ’न्योन्यम् अलक्ष्यमाणम्
 
 
अनुवाद
उन सभी गोपियों द्वारा सेवा किए जाने पर, जिनके हृदय उनके प्रति अत्यधिक स्नेह से पिघल रहे थे, कृष्ण ने प्रत्येक को, दूसरों की नजरों से ओझल, अपने चबाए हुए पान के बहुमूल्य अवशेष दिए।
 
Being served by all the gopis, whose hearts were melting with immense affection for Him, Krishna gave each one, out of sight of others, the precious remains of the betel leaf He had chewed.
तात्पर्य
कृष्ण, अपनी सेवा प्राप्त करने की अपेक्षा अपने भक्तों की इच्छाओं की पूर्ति के लिए अधिक उत्सुक होते हैं। इस अवसर पर उसने सभी गोपियों को अपने पान का प्रसाद दिया। हालाँकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि कृष्ण सभी गोपियों के साथ ठीक उसी तरह से व्यवहार करते थे; उन्होंने प्रत्येक के साथ व्यक्तिगत रूप से और एकांत में व्यवहार किया।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)