श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.6.135 
माता स्नेहातुरा मन्त्रान्
पठन्ती भुक्त-जारकान्
वाम-पाणि-तलेनास्यो-
दरं मुहुर् अमार्जयत्
 
 
अनुवाद
कृष्ण की माता स्नेह से व्याकुल होकर मंत्रों का जाप कर रही थीं और अपने बाएं हाथ से बार-बार उनके पेट को सहला रही थीं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उन्होंने जो खाया है, वह पच जाए।
 
Krishna's mother, overwhelmed with affection, was chanting mantras and repeatedly caressing his stomach with her left hand to ensure that whatever he had eaten was digested.
तात्पर्य
ऐसे प्यार से बनाये हुए भोजन से अपचन का कोई डर नहीं था, लेकिन माँ यशोदा अपने बेटे को खुश और आरामदायक रखने की बात में जुनूनी थीं। उनके लिए उनसे अनूठा प्रेम था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)