श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 129
 
 
श्लोक  2.6.129 
तर्जन्य्-अङ्गुष्ठयोः कियत्
जिह्वाग्रे न्यस्य चक्रे ’सौ
निम्ब-वन् मुख-विक्रियाम्
 
 
अनुवाद
कृष्ण ने अपने अंगूठे और तर्जनी के नाखूनों से कुछ मिठाइयाँ उठाईं और उन्हें अपनी जीभ पर रखा। फिर उन्होंने ऐसा मुँह बनाया मानो उनका स्वाद कड़वे नीम जैसा हो।
 
Krishna picked up some sweets with the nails of his thumb and forefinger and placed them on his tongue. Then he made a face as if they tasted like bitter neem.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)