श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  2.6.110 
श्री-सरूप उवाच
तत् सौन्दर्यं सा च लावण्य-लक्ष्मीस्
तन् माधुर्यं तस्य किं वर्णितं स्यात्
द्रव्यैर् योग्या लौकिकैर् नोपमा स्यात्
किं वान्येन द्वारकेन्द्रेण नापि
 
 
अनुवाद
श्री स्वरूप ने कहा: क्या उनके सौन्दर्य, उनके तेजोमय रंग या उनके मनमोहक माधुर्य का वर्णन करना संभव है? इस संसार की कोई भी वस्तु उस माधुर्य की तुलना नहीं कर सकती, यहाँ तक कि अन्य रूपों में भगवान की माधुर्य की भी नहीं, यहाँ तक कि द्वारकाधीश के रूप में भी नहीं।
 
Sri Svarupa said: Is it possible to describe His beauty, His radiant color, or His captivating sweetness? Nothing in this world can compare to that sweetness, not even the sweetness of the Lord in other forms, not even as Dwarkadhish.
तात्पर्य
उनके शरीर के अद्वितीय कांति में, उनके सभी अंगों के ऊँचे अनुपात और समरूपता में, और उनके रूप के समग्र रूप से वैभव और आकर्षण में, कृष्ण की सुंदरता अद्भुत हैं। कमल के फूल जैसी सुंदर चीज़ों से उसकी आँखों और दूसरी विशेषताओं की तुलना करने का प्रयास उनकी सुंदरता के साथ न्याय नहीं कर पाता। वास्तव में, कृष्ण की सुंदरता की तुलना श्री विष्णु और भगवान के अन्य रूपों से करना भी बेकार है, जो भौतिक दुनिया के तरीकों का अनुकरण करते हैं, या यहाँ तक कि श्री नारायण, या अयोध्या के भगवान, या द्वारका के श्री यदुनाथ कृष्ण से भी उनकी तुलना करना बेकार है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)