श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  2.6.105 
श्री-सरूप उवाच
तासां निरीक्षमाणानां
परितः स्व-प्रियं मुहुः
परिहासोत्सुकं चित्तं
वृद्धाभिप्रेत्य साब्रवीत्
 
 
अनुवाद
श्री सरूप ने कहा: जब गोपियाँ अपने प्रियतम कृष्ण के चारों ओर खड़ी होकर बार-बार उनकी ओर देख रही थीं, तो एक वृद्ध महिला ने देखा कि कृष्ण कुछ विनोदपूर्ण बातें कहने के लिए उत्सुक लग रहे हैं। इसलिए वह बोल पड़ी।
 
Sri Sarup said: As the gopis stood around their beloved Krishna, glancing repeatedly at him, an elderly woman noticed that Krishna seemed eager to say something humorous. So she spoke up.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)