श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 6: अभीष्ट-लाभ (सभी इच्छाओं का प्राप्ति)  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  2.6.102 
एवम् अन्योन्य-सौहार्द-
भर-प्रकटनेन हि
वेशः समाप्तिं नायाति
लोप्यमानस् तथा मुहुः
 
 
अनुवाद
इन सब प्रेम-प्रसंगों के बीच, सजावट कभी पूरी नहीं हो पाई। गोपियों को बार-बार अपने प्रयास मिटाने पड़े।
 
Amidst all this lovemaking, the decorations were never completed. The gopis had to repeatedly erase their efforts.
तात्पर्य
इन विक्षेपों के कारण गोपियों के लिए कृष्ण के मस्तक पर तिलक लगाना, उनके हाथों में चित्र बनाना और इस प्रकार के अंतिम कार्य करना मुश्किल हो गया। कई बार उन्होंने निर्णय लिया कि यह सही ढंग से नहीं किया गया। इसे मिटा दो और फिर से करो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)