श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 92
 
 
श्लोक  2.5.92 
तत्-तन्-महा-प्रेम-विहार-कामः
कस्मिन्न् अपि द्वापर-काल-शेषे
गोलोक-नाथो भगवान् स कृष्णः
कृत्स्नांश-पूर्णो ’वतरत्य् अमुष्मिन्
 
 
अनुवाद
जब गोलोक के स्वामी भगवान कृष्ण अपनी सर्वोच्च शुद्ध प्रेम की विविध लीलाओं का आनन्द लेना चाहते हैं, तो एक निश्चित द्वापर युग के अंत में वे अपने समस्त अंशों सहित इस भौतिक जगत में उस विशेष स्थान पर अवतरित होते हैं।
 
When Lord Krishna, the Lord of Goloka, desires to enjoy the various pastimes of His supreme pure love, at the end of a certain Dvapara Yuga, He descends with all His parts to that particular place in this material world.
तात्पर्य
इस श्लोक से लेकर 172वें श्लोक तक, नारद अब भौम-वृन्दावन, जो पृथ्वी पर गोलोक की अभिव्यक्ति है, की सर्वाधिक गोपनीय महिमाओं का वर्णन करते हैं। इन महिमाओं की स्थापना के लिए आधार तैयार करने के लिए, 92 से 101 तक के श्लोकों में वह पहले उस निवास के स्वामी की अतिम श्रेष्ठता का प्रदर्शन करते हैं।

वर्तमान श्लोक वर्णन करता है कि क्यों और कब गोलोकानाथ मथुरा में पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। उनके अवतरित होने का कारण अपनी स्वयं की इच्छाओं को संतुष्ट करना है; उन्हें प्रेम के सुपरचार्ज के आनंद का स्वाद लेने की उत्सुकता है। और वह समय जब वह अवतरित होते हैं द्वापर-युग के अंतिम सांसारिक वर्षों के दौरान है, वह युग जो अपने प्रभात से सांध्य तक देवताओं के 2,400 वर्षों तक चलता है। लेकिन जैसे कि हम प्रामाणिक शास्त्रों से जानते हैं, कृष्ण प्रत्येक द्वापर-युग के अंत में पृथ्वी पर नहीं आते हैं बल्कि ब्रह्मा के दिन में सातवें मन्वंतर के केवल अट्ठाईसवें द्वापर-युग में अवतरित होते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)