स च तद्-व्रज-लोकानां
श्रीमत्-प्रेमानुवर्तिना
कृष्णे शुद्ध-तरेणैव
भावेनैकेन लभ्यते
अनुवाद
उस परमधाम तक केवल शुद्धतम भावनाओं के द्वारा ही पहुँचा जा सकता है, जिसमें व्रजवासियों के कृष्ण के प्रति उदात्त प्रेम का अनुसरण किया जाता है।
That supreme abode can be reached only through the purest of feelings, following the sublime love of the Vrajavasis for Krishna.
तात्पर्य
गोलोक केवल अचूक प्रेम से ही प्राप्त किया जा सकता है, जो ज्ञान, कर्म अथवा अन्य किसी भौतिक प्रयास से अछूता हो, और जो नंद महाराज के पुत्र पर केंद्रित हो। और इस प्रकार के प्रेम को सीखने के लिए, किसी को व्रजवासियों जैसे श्री नंद और यशोदा के उदाहरणों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए, और विशेष रूप से श्री राधा और उनकी सखियों के आदर्श उदाहरणों का।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥