श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 78
 
 
श्लोक  2.5.78 
श्री-नारद उवाच
गोपाल-देव-प्रिय गोप-नन्दन
श्रीमान् इतो दूर-तरो विराजते
गोलोक-नामोपरि सर्व-सीम-गो
वैकुण्ठतो देश-विशेष-शेखरः
 
 
अनुवाद
श्री नारद बोले: हे गोपालदेव! हे गोपालपुत्र! यहाँ से बहुत दूर गोलोक नामक परम श्रेष्ठ स्थान है। यह समस्त वैभवों से परिपूर्ण है और वैकुंठ सहित अन्य सभी लोकों की सीमाओं से परे है।
 
Sri Narada said: O Gopaladev! O son of Gopala! Far away from here is the supremely elevated place called Goloka. It is filled with all splendors and transcends the boundaries of all other worlds, including Vaikuntha.
तात्पर्य
गोप-कुमार गोपाल-देव-प्रिय दो प्रकार से हैं: भगवान गोपाल उन्हें प्रिय हैं, और वे स्वयं भगवान गोपाल को प्रिय हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि गोप-कुमार एक गोप-नंदन हैं, जो श्री गोवर्धन पर्वत के एक युवा ग्वाला बालक हैं।

गोलोक अन्य सभी आध्यात्मिक ग्रहों से ऊपर है, क्योंकि यह हर तरह से श्रेष्ठ है। ब्रह्म-संहिता (5.43) बताती है:

गोलोक-नाम्नि निजा-धामनि तले च तस्य

देवी-महेश-हरि-धामसु तेसु तेषु

ते ते प्रभवा-निकया विहिताश्च येन

गोविंदम आदि-पुरुषं तमहं भजामी

"सबसे नीचे देवी-धाम [भौतिक दुनिया] है, उसके ऊपर महेश-धाम [महेश का निवास] है, महेश-धाम के ऊपर हरि-धाम [हरी का निवास] है, और इन सबसे ऊपर कृष्ण का अपना राज्य है, जिसका नाम गोलोक है। मैं आदिम भगवान गोविंद की पूजा करता हूं, जिन्होंने श्रेणीबद्ध लोकों के शासकों को उनके संबंधित अधिकार आवंटित किए हैं।" ब्रह्मांड के आठ आवरण, जिसकी अध्यक्षता दुर्गा करती हैं और भगवान शिव का निवास और भगवान हरि का वैकुंठ साम्राज्य सभी गोलोक के नीचे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)