श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  2.5.52 
यथा हि भगवान् एकः
श्री-कृष्णो बहु-मूर्तिभिः
बहु-स्थानेषु वर्तेत
तथा तत्-सेवका वयम्
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण अनेक रूपों में तथा अनेक स्थानों पर विद्यमान रहते हैं, उसी प्रकार हम भी, उनके सेवक, अनेक रूपों में विद्यमान रहते हैं।
 
Just as Lord Krishna exists in many forms and in many places, similarly we, his servants, also exist in many forms.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)