श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  2.5.49 
एकदा नारदं तत्रा-
गतं वीक्ष्य प्रणम्य तम्
हर्षेण विस्मयेणापि
वेष्टितो ’वोचम् ईदृशम्
 
 
अनुवाद
एक दिन मैंने नारद जी को आते देखा। मैंने उन्हें प्रणाम किया और अत्यंत प्रसन्नता और विस्मय में उनसे इस प्रकार कहा।
 
One day I saw Narada approaching. I bowed to him and, in great joy and amazement, said to him as follows.
तात्पर्य
गोपा-कुमार को उनके लंबे समय से मनचाहे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, नारद सही समय पर ही आए और उन्हें श्री गोलोक के महिमाओं के बारे में बताया और गोलोक कैसे प्राप्त किया जाए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)