श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 258
 
 
श्लोक  2.5.258 
मन्ये मद्-ईश्वरो ’वेत्य
कामम् एतं तवोत्कटम्
तां नेष्यत्य् एष भूमिं त्वां
स्वयं स्वस्य प्रियां प्रियं
 
 
अनुवाद
मुझे यकीन है कि मेरे प्रभु आपकी प्रबल इच्छा को पहले से ही जानते हैं। इसलिए वह आपको, अपने प्रिय मित्र को, स्वयं अपने परम प्रिय धाम में ले जाएँगे।
 
I am sure that my Lord already knows your strong desire. Therefore, He will personally take you, His dear friend, to His beloved abode.
तात्पर्य
गोप कुमार ये मान सकते हैं कि यात्रा करने के लिए उन्हें भगवान से अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है; लेकिन फिर भी, जाने से पहले, वे भगवान के शुभ दर्शन की इच्छा कर सकते हैं। इसलिए उद्धव गोप कुमार से कहते हैं कि कृष्ण उनकी यात्रा पर उनके साथ जाएंगे। वृंदावन कृष्ण के लिए प्रिय है, और गोप कुमार भी हैं। इसलिए कृष्ण स्वयं निश्चित रूप से गोप कुमार को वृंदावन ले जाएंगे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)