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श्री बृहत् भागवतामृत
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खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य
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अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)
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श्लोक 253
श्लोक
2.5.253
तत्रैव साधनं सत्यं
साधु सम्पद्यते ’चिरात्
वैकुण्ठोपरि विभ्राजच्
छ्रीमद्-गोलोक-यापकम्
अनुवाद
वहाँ, बिना किसी विलम्ब के, आप निश्चित रूप से आध्यात्मिक साधना में सफल होंगे जो आपको वैकुण्ठ से ऊपर के उज्ज्वल लोक - श्री गोलोक में ले जाएगा।
There, without any delay, you will surely succeed in spiritual practice which will take you to the bright realm above Vaikuntha – Sri Goloka.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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