वृन्दावनं सखी भुवो वितानोति कीर्तिं
यद् देवकी-सुत-पदाम्बुज-लब्धा लक्ष्मी
गोविन्द-वेणुं अनु मत्त मयूर नृत्यं
प्रेक्ष्यद्रि-सान् ववरता्न्य समस्ता सत्त्वं
"हे सखी, व्रजभूमि पृथ्वी की कीर्ति का विस्तार कर रहे हैं, इसने देवकी के पुत्र कृष्ण के चरण-कमलों के खजाने को प्राप्त किया है। पहाड़ी की चोटी से देखे जाने पर, जब मोर गोविंद की बाঁसुरी की धुन पर झूमकर नाचते हैं तो इसको देखकर अन्य प्राणी सभी झूमने लगते हैं।" (भागवतम् 10.21.10)
