श्री बृहत् भागवतामृत  »  खण्ड 2: उत्तर-खण्ड: श्री गोलोक महात्म्य  »  अध्याय 5: प्रेम (भगवान का प्रेम)  »  श्लोक 251
 
 
श्लोक  2.5.251 
यया हृत्-क्षोभ-राहित्यान्
महा-कौतुकतो ’पि ते
वृत्तं भाव-विशेषेण
तत्-तल्-लोके ’च्युतेक्षणम्
 
 
अनुवाद
आपकी भोली-भाली प्रवृत्ति ने आपको एक सरल हृदय की व्याकुल जिज्ञासा का अनुभव कराया। इस प्रकार आपने प्रत्येक लोक में भगवान अच्युत की खोज का विशेष आनंद प्राप्त किया।
 
Your innocence made you experience the restless curiosity of a simple heart. Thus, you experienced the special joy of searching for Lord Acyuta in every planet.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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